सम्मति : अवधेश सिंह की कविताओं के संबंध में वरिष्ठ व प्रख्यात साहित्यकारों के विचार 

Poet Dr. Ram Daras Mishra New Delhiप्रख्यात वरिष्ठ व्योवृद्ध साहित्यकार डॉ राम दरस मिश्र नें स्पष्ट किया कि “ठहरी बस्ती ठिठके लोग” की कविताओं से गुजरना प्रीतिकर लगा इन तेईस कविताओं में आज के विषय यथार्थ के विविध आयामों की यात्रा की गयी है । कवि की प्रगतिशील दृष्टि नें एक ओर सामान्य जन के दुख-दर्द और समस्याओं को दूसरी ओर आभिजात समाज के छदम को पहचाना है ।जिंदिगी और कविता के सम्बन्धों के माध्यम से कवि नें जिंदिगी के काटों के बीच आशा के फूल खिलाएँ हैं । यही कवि कर्म है ।

अनेक विषमताओं से यह दुनिया बनी है । इसके रचयिता से हम शिकायत नहीं कर सकते किन्तु कवि जो दुनिया बनाता है उसकी विषमताओं और कुरूपताओं के लिए उससे सवाल किए जा सकतें हैं । इसलिए कवि जो दुनिया रचता है वह मूल्य वादी होती है । कवि तमाम विषमताओं और विडंबनाओं पर चोट करता हुआ एक सुंदर दुनिया बनाता है जिसमें मनुष्यता की छवि उजागर होती है । अवधेश जी ने यही कार्य किया है .....”

 

Poet Dr. Ganga Prasad Vimal New Delhiप्रख्यात व वरिष्ठ साहित्यकार डॉ गंगा प्रसाद विमल  ने “ठहरी बस्ती ठिठके लोग” कविता संग्रह के लोकार्पण कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए कहा कि “ कविता आखिर क्या है कवि इसे क्यों लिखता है इन बातों पर अगर गौर किया जाए तो कहा जा सकता है कि कविता एक शक्ति है जो काम करोड़ों रुपए खर्च करके नहीं किया जा सकता है वह एक कविता के माध्यम से हो जाता है । श्री अवधेश सिंह ने कविता संग्रह में जीवन के अर्थमय सूत्रों को पकड़ने की कोशिश की है ।“ 

Writer Dr. Kamal Kishore Goyanka New Delhi कविता संग्रह “छूना बस मन प्रेम कविताओं का संग्रह है और इसमें प्रेम की कई नई अनुभूतियाँ तथा ताजा संवेदनाओं का रसास्वादन करने का सुयोग मुझे मिला । इन प्रेम –कविताओं को पढ़कर लगा की अवधेश जी ने इतने विलंब से इन्हे क्यों प्रकाशित कराया और क्यों नहीं इस धारा को आगे बढ़ाया । इधर हिन्दी में प्रेम कविताओं का अकाल पड़ गया है, प्रेम जैसे गायब हो गया है । कवि के लिए प्रेम एक शाश्वत विषय है , उससे उसकी मुक्ति संभव नहीं

- डॉ० कमल किशोर गोयनका 

Poet Dr. Kunwar Beichen Ghaziabadअवधेश सिंह के कविता संग्रह "छूना बस मन" ने प्रेम के माधुर्य को विशेष गरिमा प्रदान की है। कवि की प्रेम के प्रति गहरी अनुभूति "अभिव्यक्ति" को उद्दात रूप प्रदान करती है। यहाँ प्रेम अपनी कलात्मक और कोमल स्वरुप में प्रतिबिंबित होता है। संग्रह की पहली कविता "प्यार में कुछ तो होता है खास ..." को प्रेम के दस व्यापक बिन्दुओं पर सीधी अभियक्ति है और प्रिय की सुंदरता को कवि ने यह कह कर कि "तुम्हे देख लगा / गजलों की मैंने देखी / पहली रूमानी किताब" पर कवि ने सोंदर्य वर्णन की पराकाष्ठा को छुआ है। इस संग्रह "छूना बस मन" में अवधेश सिंह प्रेम के संदर्भ में "मन" की सत्ता को ही सर्वोच्च मानते हैं "उद्धव मन न भये दस बीस " में मन के तमाम रूपों के अस्तित्व के दर्शन हैं जिससे यह संग्रह पठनीय और प्रेम की सात्विक गहन अनुभूतियों का प्रतिमान बनता है।"
- डॉ० कुँअर बेचैन [प्रख्यात साहित्यकार ग़ज़ल कार ]

Poet Dr. Brejendra Tripathi New Delhiडॉ. ब्रजेन्द्र त्रिपाठीप्रख्यात साहित्यकार , विशिष्ट वक्ता , पूर्व उप सचिव , साहित्य आकेदमी ने कहा कि कविता संग्रह का नाम ठहरी बस्ती ठिठके लोग ही इसके विषय वस्तु को दर्शाता है अवधेश जी ने सभ्रांत वर्ग और झोपड़ पट्टी दोनों के जीवन को बड़े गौर से दर्शाया है और कवि कि नजर उन सभी पक्षों पर पड़ी है जिससे आम आदमी प्रभावित होता है । 

Poet Dr. Suresh Rituparn New Delhiडॉ सुरेश ऋतुपर्ण जो की वर्तमान में के. के. बिड़ला फाउंडेशन में निदेशक के रूप में कार्यरत हैं ने कहा कि “संग्रह कि कवितायें सामयिक हैं और समाज कि विपन्नता व पीड़ाओं से जुड़ी हैं जबकि लेखक यदि चाहते तो इसमें अपनी कुछ प्रेम कवितायें भी रख सकते थे , फिर उन्होने सवाल किया कि क्या इस दौरान लेखक को प्रेम नहीं मिला ? ।“ बच्चों को जीवन के शॉर्ट कट रास्ते से आगाह करने वाली विशिष्ट बच्चे शीर्षक से जुड़ी कविता कि लाइनों को अपना समर्थन देते हुए उन्होने कवि की अनुभूतियों को प्रभावकारी बताया । 

Poet Dr. Divik Ramesh New Delhiअवधेश सिंह के कविता संग्रह "छूना बस मन" ने दुर्लभ होते हुए प्रेम को सम्भव किया है संग्रह की कविताओं की ताकत उनके सीधे-सच्चेपन में है । न ये कृत्रिम हैं और न ही सजावटी। ये इतनी पकी भी नहीं है कि उनमे से कच्चेपन की एकदम ताजा खुशबू गायब हो। प्यार की मासूमियत और ललक यहां बरबर हिलोरे लेती है जिसमें कवि की आस्था एक ऐसे प्यार में है जो किसी भी स्थिति में शिकायत के दायरे मे नहीं आता। इस भयावह, क्रूर ऒर अत्यधिक उठा-पटक वाले राजनीतिक परिवेश में अवधेश सिंह ने अपनी कविताओं में प्रेम को बचाना सम्भव किया है । प्रेम के साहित्यक इतिहास के वर्तमान दौर में ऐसा नहीं कि समकालीन कवियों में कविता में प्रेम बचाने की चिंता एकदम गायब हो। अशोक वाजपेयी तो इसके लिए लगातार पैरवी भी करते रहते हैं । कुछ वर्षों पहले कवि अजित कुमार ने अच्छी प्रेम कविताएं दी थीं। लेकिन कोई युवा कवि आज के माहौल में प्रेम कविताओं का संग्रह लेकर आए तो यह पहली प्रतिक्रिया हो सकती है की क्या कवि आज के जलते हुए परिवेश से परिचित होने के बावजूद भी प्रेम की खोज को ही अपनी राह बनाना चाहता है...”
- डॉ० दिविक रमेश [प्रख्यात साहित्यकार, कवि ]

Poet Dr. BL Gaur New Delhiडॉ डॉ बी एल गौर संपादक ‘‘द गौड़सन्स टाइम्स’’ द्विभाषिक पाक्षिक समाचार-पत्र ने अपने वक्तव्य में कहा " मुक्त छंद में लय लाना एक विशेषता है बड़ी सोसाइटी व झोपड़ पट्टी किसी कवि की आत्मा को छूए और वह अनुभूति को शब्दों में व्यक्त करे यह उसकी क्षमता है, किताब के माध्यम से अवधेश सिंह ने अपने को एक अच्छा रचनाकार साबित किया है,“

Poet Dr Radheshyam Bandhu अवधेश सिंह के कविता संग्रह ठहरी बस्ती-ठिठके लोगकी कवितायें निश्चितरूप से उपभोक्तावादी, यथास्थितिवादी सोच वाले लोगों के लिए भी चुनौतीपूर्ण सवाल प्रस्तुत करती हैं कि यदि बस्ती के लोगों की जिन्दगी में ठहराव और उदासीनता है तो उसके लिए कौन जिम्मेदार है? कविता में थोथी बौद्धिकता की शाब्दिक, भाषिक बाजीगरी करने वाले कवियों से भी यह सवाल है कि क्या उन्होंने इस सामाजिक निष्क्रियता और प्रतिगामिता के बारे भी कभी सोचा कि इसके लिए कौन जिम्मेदार है? इस द्रष्टिकोण से अवधेश सिंह की सामाजिक सरोकारों की जागरूक कवितायें सीधी -सहज भाषा में आम आदमी के दुख-दर्द, गरीबी, भुखमरी, बेरोजगारी को विषय बनाकर उनसे संवाद स्थापित करने का प्रयास करती हुई भी प्रतीत होती हैं साथ ही उनकों इन असंगतियों से जूझना भी सिखाती हैं। हम देखते हैं कि प्रत्यक्षतः ये गद्य कवितायें हैं किन्तु इनकी अन्तरात्मा की आन्तरिक बुनावट पूर्णरूपेण गीतात्मक है।- डा. राधेश्याम बंधु

Poet Dr Varun Kumar Tiwariकविता संग्रह "छूना बस मन आज के दिखावा संस्कृति पर एक साहित्यक कटाक्ष है। प्रेम विषय पर विदेशी सोच का विपरीत असर भारतीय युवाओं पर पड़ रहा है, स्वछंदता खुलापन भारतीय संस्कृति का प्रेम नहीं है, लेबनान अमेरिकन साहित्यकार खलील जिब्रान की रचनाओं को इस आलोचना मे सन्दर्भ के रूप में लिया जाना चाहिए जिसमे , अवधेश सिंह की रचनाओं में निहित पीढ़ियों के निरंतर जीवन में प्रेम तथा इसकी सहभागिता के नये अर्थ की ब्याखा दिखती है इससे  यह संग्रह एक साहस पूर्ण प्रेम अभिव्यक्ति बन जाता है । अवधेश सिंह की अनभूतियाँ गहराई युक्त हैं और संग्रह की कविताओं में प्यार में कुछ तो होता है खास” की पंक्तियों "फूलों की डालियाँ / जमीं तक झुक आती हैं / कदम सीधे नहीं पड़ते / दहलीजें मुस्करातीं हैं / मन उड़ हो जाता है आकाश ...../ प्यार में कुछ तो होता है खास " इसका एक उदाहरण है । इसमें “दूधिया बल्ब से सपने” छूना बस मन” शीर्षक की कवितायें संग्रह की श्रेष्ठ रचना हैं”

डॉ वरुण कुमार तिवारी [ प्रख्यात कवि व साहित्यकार आलोचक]

Poet Anil Joshi New Delhi धनानंद और तुलसी दास की रचनाओं में प्रेम की नैसर्गिकता व व्यापकता को उदाहरण में रखते हुए प्रेम में निहित भक्ति और अध्यात्म को वास्तविक व सुखकर प्रेम माना जा सकता है, कविता संग्रह "छूना बस मन में मन के विभिन्न रूपों की व्यक्त करती संग्रह की बड़ी कविता "उद्धव मन न भये दस बीस " इस भाव का स्पस्ट उदाहरण है। यह इस संग्रह की विशेषता है की कवि की अनुमति प्रेम के विषय में बस "छूना बस मन" ही है ”। 
- अनिल जोशी [ हिन्दी आंदोलन से जुड़े प्रख्यात कवि व व्यंगकार]

Writer Dinesh Kumar मैं बड़ी साहित्यक आलोचनाओं को सिरे से नकारते हुए कहना चाहता हूँ की प्रेम कविताओं का यह संग्रह वैलेंटाइन के माध्यम से हो रहे दिखावे वाले प्रेम के व्यापारिक करण को ख़ारिज करने वाला "वास्तविक प्रेम भाव" की पूरक रचनाओं का संग्रह है।  जायसी में प्रेम रचनाओ के सन्दर्भ को लिया जाए तो इस संग्रह की कविताओं का भाव तथ्य पूर्ण संवेदनशील व मन को छूने वाला है जहाँ प्रेम समाज के व्यापक द्रष्टि कोण का समर्थन करता अभिव्यक्त हुआ है। संग्रह की कविता “प्रेम ख़त” में समाज का हस्तछेप दीखता है यह कविता संग्रह की प्रतिनिध कविता है।- दिनेश कुमार [  साहित्यक पत्रिका हंस के ख्याति प्राप्त स्तम्भ कार ]