पुस्तके मिली  - आभार सहित        


 

अरविन्द श्रीवास्तव की कविताओं का संग्रह "राजधानी में एक उजबेक लड़की "अरविन्द श्रीवास्तव की पुस्तक "राजधानी में एक उजबेक लड़की "  कवि की वह अंतर्खोज की व्यथा - कथा है जिसमें घोर अँधेरे में उजालों को पकड़ने का प्रयास किया गया है। मरघट में  बैठ कर जीवन के स्पंदन की अनुभूति , घोर निराशा के पलों में, उससे भी अति निराशा के पलों से  न पीड़ित  होने की सुखानुभूति में रची बसी उनकी कवितायेँ एक ओर बोझिल मन को संसार के तमाम बोझों के सामने हल्का फुल्का करती दिखाई देती हैं और दूसरी ओर कातिल से आँख मिलाने का सामर्थ्य प्रदान करती हैं। यह संग्रह एक शक्ति हीन - दीन -दुखियारे व्यक्ति की आत्म कथा सी लगने लगती है जब कवि इश्वर द्वारा प्रदत्त नैसर्गिक ताकत को अनदेखा करते हुए संदेहों , बुरे सपनो , जटिल वास्तविकताओं के धरातल में सब कुछ सत्यम शिवम् सुन्दरम सा हो इसके लिए प्रार्थना करता है


 

डॉ. अवनीश सिहं चौहान का नवगीत संग्रह ‘टुकड़ा कागज का’ शिल्पकार जब अपने शिल्प को तराशता है तो वह एक ही समय में दो सृजन करता है, एक अन्तस की गहराइयों में सृजित होता है तो दूसरा स्थूल-जगत में मूर्तिमान हो उठता है। स्थूल-जगत में आकारबद्ध होने वाली प्रत्येक वस्तु नश्वर है। किन्तु हृदय के सूक्ष्मतम में होने वाला सृजन अविनाशी है। क्योंकि सृष्टि का चिरतंन सत्य ‘स्पन्दन’ है। पायल की छनछन हो, शिशु की किलकन हो, बछड़े की रंभन हो! जब तक स्पन्दन है, कविता का मरना निष्चित ही असंभव है। डॉ. अवनीश सिहं चौहान का नवगीत संग्रह ‘टुकड़ा कागज का’ ऐसे ही चिरंतन सत्य से साक्षात्कार करवाती रचनाओं का संग्रह है।संग्रह में अंतर-जगत की गहराइयों को छूता मन है तो, बाह्य-जगत की विषमताओं से परिचय करवाती मनःस्थिति है।


 

सरोज श्रीवास्तव ‘स्वाती’ की कविताओं का संग्रह ‘कमल पुरइन और तुम’ ‘कमल पुरइन और तुम’ कविताओं का संग्रह अभी हांथ मे ही है और मैं अपने ‘कमल’ यानि मन, ‘पुरइन’ यानि त्यागे गए अहंकार और ‘तुम’ यानि मन के अंदर समाहित खुद को यानि ‘मैं’ को पढ़ना शुरू कर देता हूँ। मैं जो प्रेम में डूबा है, स्मृतियों से अभिभूत है । यह इस किताब की एक विशेषता हो सकती है ।  

कदाचित यही भाव भूमिका इस संग्रह की कविताओं की रचयिता है, जहां कमल का संदर्भ हृदय से है और पुरइन कमल से टूट कर अलग हुए पत्ते नहीं हैं बल्कि हृदय से अलग हुए अहं भाव हैं, जिससे उद्घाटित है एक नया ‘स्वयं’ है, जिसे लेखिका ने तुम कह कर संबोधित किया गया है।


 

पुस्तक: धार पर हम (दो), लेखक: वीरेन्द्र आस्तिक, मूल्य: 395 रु, प्रकाशक: कल्पना प्रकाशन, दिल्लीगीत से नवगीत तक की काव्य – यात्रा केवल छंद रचना की अभिव्यक्ति नहीं हैं बल्कि यह सम्पूर्ण भाव की समुचित रचना धर्मिता है। समस्त रस व भाव को आत्मसात कर नवगीत का सृजन करना और उसे वर्तमान की कसौटी पर खरा साबित करना अपने आप में एक बड़ी रचनात्मक सफलता है। एक दशक पूर्व 1998 में श्री वीरेन्द्र आस्तिक की पहली पुस्तक ” धार पर हम ” में रचना धर्मिता के साथ तात्कालिक परिवेश की धार पर चलने वाले सोलह चर्चित नवगीतकारों की रचनाओं का संकलन प्रकाशित हुआ था। इस प्रथम खंड पर नवगीत धारा की धार के प्रदर्शन में जहाँ एक ओर आस्तिक जी का विस्तृत रास्ट्रीय पटल पर जाँच परख का विचार मंथन था वहीँ 2011 में प्रकाशित इस दितीय खंड में नवगीत की व्यापकता पर समर्थन जुटाने का भागीरथी प्रयास झलकता है ।इन दोनों साहित्यक दस्तावेजों को आने वाला हिंदी साहित्य का इतिहास एक धरोहर के रूप में अवश्य देखेगा ऐसा मेरा मानना है।

इतना तो तय है की नई कविता के सभी तेवर नव गीत विधा में अपनी उच्चता के साथ प्रकट हो रहें हैं। यह उन लोगों को संतुष्ट करने के लिए पर्याप्त हैं जिनकी आलोचनाओं के केंद्र में नवगीत विधा गुजर रही थी


 

अवधेश सिंह का कविता संग्रह ‘छूना बस मन’अवधेश  सिंह ने जब जल्दी ही प्रकाशित होने जा रहे अपने कविता- संग्रह ’छूना बस मन’ की कविताएं देते हुए जब कहा कि ये प्रेम कविताएं हॆं तो मॆं थोड़ा चॊंका। उत्सुकता हुई कि देखूं कि इस भयावह, क्रूर ऒर अत्यधिक उठा-पटक वाले राजनीतिक परिवेश में कॆसे प्रेम बचा रह गया ऒर कॆसे इस कवि ने अपनी कविताओं में प्रेम को बचाना सम्भव किया।

ऎसा नहीं कि समकालीन कवियों में कविता में प्रेम बचाने की चिन्ता एक्दम गायब हो। अशोक वाजपेयी तो इसके लिए लगातार पॆरवी भी करते रहते हॆं। कुछ वर्षों पहले कवि अजित कुमार ने अच्छी प्रेम कविताएं दी थीं। लेकिन कोई युवा कवि आज के माहॊल में अपने पहला संग्रह प्रेम कविताओं का लेकर आए तो दोहरी प्रतिक्रियाएं एक साथ हो सकती हॆं।एक तो यह कि क्या यह कवि आज के जलते हुए परिवेश से अपरिचित हॆ ऒर दूसरी यह कि क्या यह कवि परिचित होने के बावजूद प्रेम की खोज को ही अपनी राह बनाना चाहता हॆ।

मॆं समझता हूं कि इन कविताओं की ताकत उनके सीधे-सच्चेपन में हॆं। न ये कृत्रिम हॆं ऒर न ही सजावटी।इतनी पकी भी नहीं हे कि उनमें से कच्चेपन की एकदम ताजा खुशबू गायब हो। प्यार की मासूमियत ऒर ललक यहां बरबर हिलोरे लेती हॆ:"तुम्हें देख लगा/ गजलों/ की मॆंने देखी/पहली किताब।" कवि की आस्था एक ऎसे प्यार में हॆ जो किसी भी स्थिति में शिकायत के दायरे में नहीं आता। सबूत के लिए ’स्वभाव’ कविता देखी जा सकती हॆ जिसमें प्रेमिका के द्वारा प्रेम को शब्दों न बांधने का कारण उसका नारी स्वभाव खोज लिया जाता हॆ।