प्रेम कविता - वजह
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कोई वजह तो होगी love poem by awadhesh singhकोई वजह तो होगी 
चाँदनी मुझे घेर लेती है
निराशा मुह फेर लेती है 
चाँद आसमां का 
मेरा हो जाता है 
जमीं पर आ 
नजदीक हो मुस्कराता है 

कोई वजह तो होगी 
पतझड़ बियाबान
सुगंध से महकाते हैं 
उदास पल गुम हो जाते हैं 
शाखा पत्ती झाड़ 
फूल बन जाते हैं
अवसाद गुलिस्ताँ बन खिल जाते हैं 

कोई वजह तो होगी 
गर्म हवा शीतल बन जाती है 
दरवाजे देहरी खिड़की 
आगन के झूले को 
थोड़ा रूमानी कर जाती है 
शब्द शहद हो जाते हैं 
कानों में कंगन पायल पाजेब 
मधुरता लाते हैं 

यूं ही नहीं 
कोई वजह तो होगी 
जिंदिगी के बंजर में 
अनवरत , अभी भी 
जो प्रेम का बिरवा उगाती है 
प्रिय , तुम्हारा साथ ही तो है 
जो प्रेम कविता की वजह बन जाती है 
- अवधेश सिंह [05/05/2017 ]