मेरी पुस्तकें "मैं और मेरी अनुभूतियों से जुड़ी" कविताओं के प्रकाशित संकलन हैं जो एक तरफ सृजनात्मकता के भूत व वर्तमान पर प्रकाश डालता है व दूसरी तरफ मेरे व्यक्तिगत को सार्वजनिक करता है : अनुरोध है कि कृपया अपने विचारों से मुझे अवश्य अवगत कराएं....... 


 

chhuna bas man love poetry written by awadhesh singh - 2013" मॆं समझता हूं कि इन कविताओं की ताकत उनके सीधे-सच्चेपन में हॆं। न ये कृत्रिम हॆं ऒर न ही सजावटी। इतनी पकी भी नहीं हे कि उनमें से कच्चेपन की एकदम ताजा खुशबू गायब हो। प्यार की मासूमियत ऒर ललक यहां बराबर हिलोरे लेती  हॆ:"तुम्हें देख लगा/ गजलों/ की मॆंने देखी/पहली किताब।" कवि की आस्था एक ऎसे प्यार में हॆ जो किसी भी स्थिति में शिकायत के दायरे में नहीं आता। सबूत के लिए ’स्वभाव’ कविता देखी जा सकती हॆ जिसमें प्रेमिका के द्वारा प्रेम को शब्दों न बांधने का कारण उसका नारी स्वभाव खोज लिया जाता हॆ। अच्छा यह भी हॆ कि कवि की निगाह ने प्रेम को उसके एकांगी नहीं बल्कि विविध रूपों में पकड़ा हॆ। इसीलिए प्रेम में शर्त, शंका आदि की उपस्थिति को स्वीकार करते हुए नकारा गया हॆ।प्यार को अपनेपन या अपने की खोज का पर्याय माना हॆ।"   -दिविक रमेश [ पुस्तक की भूमिका से ]     शेष देखें 


 

Thahari Basti Thithke Log poetry book written by awadhesh singh - 2014ठहरी बस्ती – ठिठके लोग’ कविता संग्रह का नामकरण मुझे बहुत अच्छा लगा । यह सच है की एक आम भारतीय वस्तुतः ठहरी बस्ती में रहता है, मशीन की तरह वह अपनी दिनचर्या में व्यस्त रहता है नौकरी , व्यापार ,कृषि व रोजी रोजगार के बीच भागम-भाग में मौजूदा रिश्तों के  जुड़ाव , स्नेह-अपनापन , रीति रिवाज , आस्थाओं - परम्पराओं का निर्वहन नितांत मशीनी रूप से, बेमन करते हुए वह जीवन को बदलती तारीखों के निर्धारित कलेंडर की तरह गुजारने को बाध्य है।  वर्तमान में भौतिकता की भयानकता देख आगे कदम बढ़ाने में डरता हुआ, पीछे आदिम युग के विषय में सोच , जीवन की तमाम रोज़मर्रा की हलचल के रहते हुए भी सब का सब ठहरा हुआहै, रुका हुआ है। लोग संकुचित, सशंकित ,संवेदना हीन सहमे –डरे ठिठके हुए से हैं। - डॉ० कमल किशोर गोयनका  [ पुस्तक की भूमिका से ]    शेष देखें 


 

nanhe panchhi child poetry written by awadhesh singhअवधेश सिंह की कविताओं का मॆं पाठक हूं लेकिन मुझे नहीं मालूम था कि वे बाल कविताओं के भी रचनाकार हॆं। उनके ऒर हिन्दी जगत के लिए यह सुखद सूचना हॆ कि 1887 से 1888 के मध्य अपनी बेटी शोभिता के जन्म के बाद उसके लालन-पलन के दॊरान, अपनी व्यक्तिगत अनुभूति के तहत उनहोंने अनेक बालकविताएं का सृजन किया। इन कविताओं को पढ़ते समय मुझे लगा हॆ कि अनेक कविताएं आज के बालकों ऒर बड़ों को भी लुभाने में सक्षम हॆं बावजूद कुछ सामान्य या ऒसत कविताओं के। संग्रह की कुछ अच्छी कविताओं में मछली सहेली, बादल, मेले में, गुब्बारा, चुनाव, आकर बिटिया को सुलाओ, चिड़िया हमें बना दो जी, आदि हॆं। यूं छोटी कविताओं मॆं भी कुछ हॆं जो जरूर ध्यान खींच सकती हॆं। जॆसे- अच्छी दादी/सुन्दर पलना/झूला झूले/प्यारा ललना। अथवा "काली बिल्ली/सफेद बिलॊटा/बिल्ली छोटी/ बिल्ला मोटा’। इअन्के अतिरिक्त मम-मम, चिड़िया आ, पट्टू, बुलबुल, शब्दों की सीढ़ी, बापू की लाठी, बीमार बिल्ली, गांधी का दुलारा, नटखट गुड़िया आदि कविताएं भी सामान्य से ऊपर की कविताएं हॆं। - दिविक रमेश [ पुस्तक की भूमिका से ]