कविता - शब्द का वजूद -अवधेश सिंह


1.
जकड लो शब्द

शब्द धारा में धरा
का वजूद
धरा ही
रह जाता है
इन्हें मत आने दो
धरातल के ऊपर ।
विचारों को
जकड लो
शब्दों के रथों पर
विचार पता नहीं
कब किस ओर
कुछ कर जाये
और हो जाये
राणा का चेतक
या बन जाये
चतुरंग सेनाओं
के आगे
दौड़ने वाला,
राजाओं के
सिंहासन को
क़दमों तले
रोंदने वाला
अश्वमेघ यज्ञ का
युद्धरागी
विजय अनुरागी
प्रतिनिध राज घोडा ।

2.

दुधारी तलवार

विचार को म्यान
में गुप्त रहने दें
विचार कई
मायनों में
दुधारी तलवार भी है
यह एक ओर
खुद को काटती है
दूसरी ओर
उनको घायल
करती है जो
इसकी राह में
आ जाते हैं ।
चिंतन के
महा चक्रवात में
विचार मंथन की
प्रक्रिया से
जब गुजरते हैं
तब कभी
उत्पन्न करते हैं
विष के हलाहल श्रोत
और कभी जीवन
अमृत के महा सागर ,
यदि रोकना है
दैत्यों को अमृत
देवों को विष
का बटवारा ।

3.
सच्चे विचार


विचार यदि सत्य का
अनुसरण करें
तो शब्द का पैना पन
कुंद , भोथरा हो जाता है
जब भी कभी यह अपने रक्त
को स्पर्श करता है,
या स्वयं की खाल को
छूता नजर आता है।

विचार कई बार स्वार्थी हो
तब शब्द ऐसे में अपंग
लंगड़ा अंधा गूंगा हो जाता है
शब्द यहाँ व्यक्त होने के पहले
ही कहीं खो जाता है।

तब सच्चे विचारों को गति दो
शब्दो को मीठा होने दो ।
बनने दो इसे पुष्प पराग
सुगंधियों की महकती सौगात
शब्दों से कांटे पोछ कर हटा दो
विचार को शीतल हवा दो।

शब्दों को त्याग, प्रेम ,समर्पण,आस्था
परहित के धागों से बांध
बस आहिस्ता से आगे बढ़ा दो
मीठे शब्दों से लदा फलदार विचार
तब कण कण में समा जाता है।

अंधेरे में उजास भर जाता है
कोई एक हममे से एक
तुलसी ,कबीर ,नानक
गांधी या ओशो सा बन जाता है।

- अवधेश सिंह