कथा : ईमानदारी की कुल्हाड़ी- अवधेश सिंह

कथा : ईमानदारी की कुल्हाड़ी- अवधेश सिंहपेड़ के नीचे लकड़ियों के छोटे ढेर पर निगाह डालते हुए लकड़हारा मायूसी से सोंच रहा था की आज की जरूरतों को पूरा करने के लिए इतनी लकड़ी पर्याप्त नहीं है, वह पुनः नदी के किनारे पेड़ की डाल पर चढ़ कर दूसरी ओर मजबूत तने के सहारे खड़ा होकर एक डाल पर निगाहें जमा पैनी कुल्हाड़ी के पुर जोर वार उस डाल को काटने हेतु करने लगा तभी अचानक उसके हाथ से कुल्हाड़ी छूट कर नीचे गिरी।

कुल्हाड़ी की तने पर की गयी चोट के जबर्दस्त उछाल से देखते देखते उसकी कुल्हाड़ी दूर नदी की धार में गिरि और समा गयी। लकडहारा हक्का बक्का पेड़ के नीचे खुद को गिरने से बचाते हुए यह दृश्य देख कर मायूसी और बेबसी के दर्द से कराह उठा। नदी अपनी धार के उफान पर मदमस्त वेग के साथ कल कल करती रही और दिन के पूर्वान्ह के तपते सूरज की उमस , तपिश और निराशा लकडहारे के बदन से बूंद बूंद कर टपकते पसीने से प्रकट हो रही थी।

निराशा , बेबसी और उदासी ने लकडहारे को घोर संकट में डाल दिया था, एक तो कुल्हाड़ी का नुकसान दूसरा लकड़ी का छोटे ढेर जिस से उसकी आवश्यकतायें पूरी जो नहीं होनी थी। उसकी रोजी रोटी का एकमात्र साधन जुटाने वाली कुल्हाड़ी नदी की गहराइयों में खो चुकी थी, उसके आँखों से अश्रुधारा अनायास ही बह चली, बाजार में वर्तमान की महगाई के चलते तमाम उधार देनदारियों के कारण उसे आज राशन के जुगाड़ के न होने का भी भय था , घर पर होने वाले कोहराम के डर से भी वह भय भीत हो चला था।

वह बुत बना ठगा सा खड़ा था तभी उसे लगा की कोई महापुरुष जैसी वेशभूषा में व्यक्ति नदी की तेज धारा को चीरते हुए उसी की तरफ आ रहा है , नजदीक आने पर उसने देखा की उसके हाथ में कोई वस्तु है जो दिन के प्रकाश में चमक रही है , पास आते ही उस महापुरुष ने लकडहारे को ढाडस बंधाते हुए उसको एक चांदी की कुल्हाड़ी दी और संतावना देते हुए कहा की यह चांदी कुल्हाड़ी नदी से निकली है यदि यह वही तुम्हारी कुल्हाड़ी है जो नदी में गिरी है तो तुम इसे रख लो। इतना कह कर वह महापुरुष बिना अपना परिचय दिए गायब हो गया।

लकडहारा को जैसे लकवा मार गया वह इस अप्रत्याशित सहायता से हतप्रभ हो गया उसने कुल्हाड़ी को देखा यह उसकी नहीं थी उसके मन में विचार आया की मददगार को यह कुल्हाड़ी वापस कर देनी चाहिए और उससे कह देना चाहिए की जो कुल्हाड़ी उसकी नदी में गिरी है वह मोर्चा खाई एक पुरानी लोहे की कुल्हाड़ी है जिसकी तेज धार से लकड़ी काट कर, उसे बाजार में बेच कर वह अपनी रोज की जरूरतें पूरी करता है.

तभी उसके मन का लालच जाग उठा और मन ने उसे टोका "नहीं यह अच्छा मौका है उसे इस चांदी की कुल्हाड़ी रख लेनी चाहिए इसे बाजार में बेचकर वह लोहे की कई नई तेज धार कुल्हाड़ी खरीद सकता है तथा बचे धन से अपने सभी कर्ज अदा कर सकता है" , तभी उसे याद आई उसकी झोपड़ी की छेद-दार छत जिससे थोड़ी ही बारिश में उसकी झोपड़ी के अन्दर का समान तर बतर हो जाता है चांदी की कुल्हाड़ी के पैसे से वह इसे भी मरम्मत कराने की सोच बैठा।

तभी उसके मन में एक अन्य महान विचार आया उसने सोचा यदि वह यह सारी बात, पूरी सच्ची कहानी शहर कोतवाल को बता कर इस चांदी की बेशकीमती कुल्हाड़ी राजा के खजाने में जमा करदे तो अवश्य ही राजा उसको इस ईमानदारी के लिए पुरुष्कार दे और उसकी गरीबी लाचारी को देखते हुए दरबार की नौकरी भी।
तभी उसने मन नें कहा "नहीं- नहीं कहीं चांदी की कुल्हाड़ी पर कोतवाल या सिपाही की बुरी नजर लग गयी, सब बेईमान जो ठहरे। चांदी की कुल्हाड़ी से भी हाथ धोना पड़ेगा और कहीं उल्टा इसकी चोरी के इल्जाम में मुझे कारावास न भेज दे। " उसने निश्चितता भरी एक लम्बी सांस ली।

अभी नदी के किनारे वह इस सोंच उधेड्बुन में खोया ही हुआ था की तेज हवा चली और उसके नजदीक ही नदी से निकलने वाला वही महापुरुष उसके सामने खड़ा था उसके हाथ में एक सुनहली वस्तु चमचमा रही थी उसने कहा , अरे लकडहारे यदि यह चांदी की कुल्हाड़ी से तुम संतुष्ट नहीं हो और अदि यह तुम्हारी खोई हुई कुल्हाड़ी नहीं है तो तुम इसे भी परख लो- जाँच लो और जो कुल्हाड़ी तुम्हारी लगे उसे रख कर दूसरी कुल्हाड़ी को नदी को वापस कर दो , यह कहते हुए उस महापुरुष ने सोने की सुनहली चमचमाती कुल्हाड़ी भी लकडहारे को सौप कर अंतर्ध्यान हो गया।

उसके नज़रों से ओझल होते ही लकडहारा कभी चांदी की कुल्हाड़ी देखता तो कभी सोने वाली कुल्हाड़ी , अब वह एक नयी उलझन आश्चर्य और असमंजस में पड़ गया , उसने विचार किया की शायद आज भाग्य उसके साथ है , शायद आज उसके सपनो के पूरे होने का समय है उसे अपने पूर्वजो के आशीर्वाद याद आने लगे , उसे अपनी घोर गरीबी -लाचारी , मायूसी , भूख ,यंत्रणा सब एक एक कर के याद आने लगीं , उसे यह सब अपनी दुखिया पत्नी द्वारा की गयी पूजा व्रत संकल्प आदि कार्यो के फल रूप में दिखने लगा । वह तमाम असमंजस - दुविधा के समुद्र में डूबने उतराने लगा, उसका एक मन कह रहा था की वो दोनों अपरचित कुल्हाड़ियों को नदी में प्रवाहित कर पुण्ड कमाए और इस पुण्ड के प्रताप को परम संतोष मान कर गरीबी - कर्ज में डूबी जिंदिगी पर पुनः चल दे।
उसका दूसरा मन कह रहा था की इस से वह क्या हांसिल कर पायेगा, वह भाग्य के उगते सूरज को नमन करे और चांदी की कुल्हाड़ी को महापुरुष के कहे अनुसार नदी को वापस कर सोने की रख ले क्यों की सोना ज्यादा महंगा बिकेगा , इसकी बिक्री से प्राप्त धन से वह और उसके शेष परिवार के जीवन हमेशा के लिए गरीबी लाचारी से मुक्त हो सकेंगे , उसकी आने वाली पुस्ते बदहाली से मुक्त हो जाएँगी और एक सम्मान और खुशहाली की जिंदिगी व्यतीत कर सकेंगी।।

विचार थे की जैसे सावन की रिमझिम , कभी फुहार , कभी बड़ी बड़ी तेज बुँदे , कभी बादल की गडगडाहट और कभी अँधेरी काली घटाओं के बीच दिल दहला देने वाली बिजली की तेज कौंध , बड़ा असहज और लाचार था वह लकडहारा, बोझिल वह वहीँ पेड़ के नीचे जमीन पर बैठ सा गया, उसे लगा जैसे उसका दिमाग काम नहीं कर रहा है।
एक ओर उसके मनो-मस्तिष्क में लालच , मौका- अवसर , बेईमानी , जलालत जहालत , गरीबी , रोज रोज की यंत्रणा उसे घेरे थी, दूसरी तरफ पाप पुण्ड ईमानदारी अपनी दलीलें दे रहे थे।
उसके सभी विचार उसे अपने अपने प्रस्ताव - सुझाव देने को तत्पर थे , सभी की विचार – बातें उसे आकर्षित कर रहीं थी । कहतें हैं गरीबी और ईमानदारी का साथ चोली दामन का साथ है।वहक्या करे और क्या नहीं। तभी समय ने अपनी व्यावहारिकता का परिचय देते हुए उससे कहा अरे मूर्ख कहाँ की ईमानदारी ,कहाँ के पुण्ड , कहाँ की निष्ठा , यह इस कलयुग में कष्ट का करक है। पाप पुण्ड के चक्कर में मत पड़ , ले भाग , मौका है दोनों कुल्हाड़ी अपने पास रख और वक्त के अनुसार उसका उपयोग कर , भाग ले ।

लकडहारा तेजी से उठा उसने चांदी और सोने की दोनों कुल्हाड़ियाँ अपने झोले में संभाल कर रक्खी, उधर नदी उसी गति से बह रही थी , सूरज पश्चिम दिशा को अग्रसर हो रहा था उस महापुरुष का दूर दूर तक पता नहीं था और वह दौड़ पड़ा बस्ती बाजार की ओर उसके पांव बहुत तेजी से दौड़ रहे थे जैसे वे धरती की स्पर्श से भी बचना चाह रहें हो।

कुछ दूर दौड़ने के बाद अभी उसने नदी की पगडण्डी पार ही की थी की उसे कुछ हट्टे कट्टे लोग उसकी ओर बढ़ते दिखे , थोडा नजदीक आने पर उसने पहचाना की वे लुटेरे हैं उनके हाथो में लाठियां दिखने लगी थी , उसे लगा की बस कुछ ही देर में उसकी दोनों कुल्हाडियों को लूट लिया जायेगा और उसकी ठुकाई भी होगी सो अलग , वह तेजी से दिशा बदल कर नदी के दूसरे छोर की ओर घाट वाले रास्ते पर दौड़ पड़ा तभी उसे लगा की बाजार में इसको बेचते समय यदि यह सूचना किसी तरह शहर कोतवाल तक पहुंची तो उसे कारावास की सजा भुगतनी पड़ सकती है। तेजी से दौड़ते हुए वह घाट के नजदीक ही था की उसे लगा की वह क्या अपनी जान जोखिम में डाल कर इस लालच और बेईमानी के काम तो नहीं कर रहा, उसे लगा की वह शायद अपने बुरे दिन खुद ही बुला रहा है। लकडहारे के भय मिश्रित विचार ने उसे फिर दुविधा में डाल दिया।

और अंततः उसने आगे न जाकर नदी की ओर दौड़ लगा दी वह तुरंत दोनों सोने व चांदी की कुल्हाडियों को गहरी नदी में फेक कर इस लालच और बेईमानी के विचारों से जैसे तत्काल छुटकारा चाहता था नदी की तेज धारा का शोर उसके कानों तक पहुचने लगा, नदी की स्वच्छ असीम जल राशी को छू कर आने वाली ठंडी हवा ने लकडहारे के पसीने पसीने हो रहे भीगे बदन में एक अजीब सी सिहरन पैदा कर दी और लकडहारा जैसे
जैसे नदी की धार की ओर बढता जा रहा था उसका मस्तिस्क तमाम दुश्चिंताओं से मुक्त होता जा रहा था, की तभी पगडण्डी से नदी की रेत के जुड़ने के बिंदु पर एक अध् कटे पेड़ के ठूठ से उसका पैर टकराया और एक जोर की चीख से वह धडाम से गिरा। ..............

लकडहारे की आँख खुल गयी वह लकड़ी का ढेर काटने के बाद थक कर गहरी नींद जो सो गया था. यह एक मात्र सपना था।
उसने देखा उसकी लोहे की वही पुरानी कुल्हाड़ी लकड़ी के ढेर के ऊपर रक्खी मानो उससे कह रही थी लालच , बेईमानी , ठोकर - पश्चाताप और पाप - निराशा से कहीं बेहतर है ईमानदारी की अभिलाषा , हर मनुष्य के पास उपर वाले ने एक कुल्हाड़ी दी है, उसी पर मनुष्य को विश्वास करना चाहिए।

यह कथा एक पुरानी कहानी का नया रूपांतरण है जो वर्तमान दौर को साथ लेकर आज की स्थितियाँ और समाज की व्यवस्थाओं को देखते हुए लकडहारे को जन सामान्य व्यक्ति के रूप में स्थापित करती है। इस अर्थ युग में , सुविधा को येन तेन प्राप्त करने की भौतिकता वादी समाज में सभी को अपनी कुल्हाड़ी पर भरोसा करना चाहिए । इस इश्वर से प्रदत्त कुल्हाड़ी के कई नाम हो सकते हैं यह पढ़े लिखो की कलम है , होनहारों का मस्तिष्क , कारीगरों की कुशलता और कामगारों के औजार। यही है उसकी ईमानदारी की कुल्हाड़ी।


- अवधेश सिंह