एक भावपूर्ण कहानी

ममत्व - अवधेश सिंह


 


"कबूतर का जोड़ा आज फिर बालकनी में सुबह से ही घोसला बनाने की जुगत करता रहा है "। छोटी साँस लेकर , "एक दाना भी हराम है जो इन कबूतरों ने पेट में डाला हो" इतना कहते हुए वाइफ ने मेरा आफिस बैग मुझसे ले रैक में रक्खा और मेरी तरफ देखते हुए बोली देखना इस बार मैं उस कबूतर और कबूतरी को घोसला नहीं रखने दूंगी, फिर वही सिस्ट , पंखों और कबूतर की डेड स्किन की गन्दगी,. . " यह कहते हुए वो किचन में चली गयी शाम की चाय बनाने के लिए और मैं हाथ मुह धोने ,कपडे बदलने अपने कमरे की ओर।

कहानी ममत्व - अवधेश सिंह हमारे नए फ्लैट की बालकनी एक सकरी बालकनी है जिसमे दोनों बेड रूम के दरवाजे खुलते हैं, बेड रूम के दरवाजे के ऊपर रोशनदान में दो विंडो एसी हैं जिनके ऊपर कबूतर अक्सर गुटरगू करते रहते हैं। मेरी वाइफ को पंछीयों से बहुत लगाव है। उनके पंछी प्रेम के चलते बालकनी के एक सिरे पर कोने में रक्खे गमले के ऊपर स्थित मुंडेर के ऊपर उनके लिए मिटटी के छिछले कटोरे में दाना - पानी की व्यवस्था है, जिसमे गौरैया -कबूतर कभी कदार बुलबुल की जमघट लगती दिखाई पड़ती है।

दूसरे सिरे पर एक बड़ी स्टील एलमिरा खड़ी है जिसमे अखवार की रद्दी आदि घर की उन वस्तुओं को जमाया गया है जिनका उपयोग रोज की जिंदिगी में नहीं होता इसलिए यह स्टील एलमिरा को शायद ही कोई खोलता है। यह स्टील एलमिरा कबूतरों को इसी कारण शायद सबसे सुरक्षित जगह लगती है , स्टील एलमिरा के नीचे एक चौरस छायादार तीन तरफ दीवाल से घिरा स्थान किसी भी शत्रु से इनको सुरक्षित रक्खेगा यह इन कबूतरों को अच्छी तरह पता जो है।

इस स्टील एलमिरा के नीचे पिछले वर्ष कबूतर के एक जोड़े ने अपना घोसला बनाया फिर उसमे अंडे रक्खे। कुछ समय बाद उसमे निकले दो चूजों को बड़े करीने से कबूतर जोड़े ने पाला और बड़ा किया। कबूतर का यह जोड़ा थोड़े ही दिनों में अपने दो छोटे बच्चों को उड़ना सिखाने लगे और वह भी एसी के ऊपर बैठ कर गुटरगू टीम में शामिल हो गए। मेरी वाइफ उन दिनों इन कबूतरों की सिस्ट और घोसले से निकलने वाली गन्दगी तथा छोटे छोटे पंखों को समेट समेट कर कूड़े दान में डालने के नए काम से उकता गयीं थी। उन्हें अपना यह पंछी प्रेम एक थकाऊ और बैठे ठाले गंदगी युक्त शौक लगने लगा था।
फिर भी वह खुश थी. कबूतर के चूजे के क्रमवार विकास में उनकी ख़ुशी ऐसी दिखती थी जैसे वह कबूतरों से कोई रिश्ता कायम किये हुए हैं। अब जब कबूतर का जोड़ा अंडे से कर चूजों की परवरिश कर रहा था तो उन्हें इस से जुड़े कार्यों में भगवान की इच्छा दिखाई देने लगी थी। हम सभी को बालकनी आहिस्ता से जाने की कड़ी हिदायत थी , शोर और अतिरिक्त हलचल से बालकनी को मुक्त एरिया घोषित किया गया था। मेरी वाइफ की सोंच थी की यदि ऐसा नहीं करेंगे तो अंडे में चूजों का विकास बाधित हो सकता है। आखिर एक जागरूक महिला से बेहतर यह कौन जान सकता है की पेट में पल बढ रहे शिशु विकास में वातावरण का कितना योगदान रहता है और अंडे के भीतर पल बढ रहे चूजे को भी तो ऐसा ही भय रहित , शांत माहोल चाहिए।

उन दिनों हमारे घर में हमारी दो बेटियों और हमारे बीच इस कबूतर के जोड़े , उनके अंडे और होने वाले खूबसूरत चूजों की चर्चा एक आम बात थी। वाइफ को अपनी इस नयी जिम्मेदारी की बड़ी चिंता रहती थी , कबूतर के बच्चों को कबूतर अच्छे से फीड दे इसलिए उन दिनों उनको अधिक प्रोटीन का , अधिक फैट का दाना चुगाने में उन्हें रूचि हो गयी थी। दिन भर कैसे उन्होंने कबूतर के अंडे की रखवाली कौओं से की , बिल्ली को हमारे फ्लैट तक फटकने से रोका यह एक अभिभावक की जिम्मेदारी से कम न था।

आज भी चाय के टेबल पर आस पड़ोस - अखवार -टीवी समाचार , साहित्यक गतिविधियों , आफिस आदि के कई मसले से ज्यादा अहम् मसला कबूतर के घोसले से सम्बंधित ही था। मामला यह है की कबूतर का एक जोड़ा पिछले वर्ष की तरह ही ,बालकनी में एक कोने पर रक्खी स्टील एलमिरा के नीचे अंडे देने हेतु अपना नया घोसला बनाने के लिए भर भर चोंच पेड़ों से सींक ला ला कर इकठ्ठा करना चाहते हैं और वाइफ उन्हें इस काम से लगातार रोकने को प्रयास रत हैं।

"सुनते हैं कबूतर बहुत चालाक हैं मैं बालकनी के दरवाजे पर ही बैठ कर अखवार पढ़ती हूँ और इन्हें भगाती रहती हूँ , एक राड से ठक ठकाये रहती हूँ , तब भी ये बाज नहीं आते ". " आज दोपहर को मैंने बालकनी के दरवाजे बंद किये और लगभग दो घंटे के लिए मार्किट गयी थी बस तभी इनको मौका मिल गया " वाइफ ने मेरी तरफ देखा , चाय की सिप लेता हुआ मैंने हामी भरी।
वाइफ ने कहा " स्टील एलमिरा के नीचे दोनों बैठे थे चुप चाप जैसे ही मैंने अलमारी के पास कदम रक्खा दोनों फडफडा कर फुर्र हो गए और मुझे शक हुआ की कहीं अंडे तो नहीं , मैंने टार्च लगाकर देखा , गनीमत थी अंडे नहीं थे , मैंने ब्रूम से इल्मारी के अन्दर की सफाई की तो जानते हैं। " मैंने फिर तन्मयता से उनको सुनते हुए हामी भरी। "पूरा घोसला बना रक्खा था , पता नहीं कब और कितनी जल्दी किया होगा यह, कूड़े दानी में फेक आई सब , इस बार मैं गन्दगी नहीं फ़ैलाने दूंगी इन्हें। दाना चुगे और उड़ जाये कहीं बस मैं यही पसंद करती हूँ " कहते हुए खाने की तैयारी के लिए लग पड़ी।

वाइफ के सुझाव पर सुबह कुछ ईंटे बेसमेंट से ढोकर लाया और वाइफ ने इनको स्टील इल्मारी के नीचे इस तरह जमाया ताकि कबूतर अन्दर घुस न सके , इस तरह कबूतरों को इल्मारी के भीतर तली में घोसला बनाने का इरादा बदलना पड़ेगा। वाइफ की इस युक्ति से मैं भी सहमत था।

ममत्व कहानी - अवधेश सिंह दोपहर को रोज की तरह वाइफ ने आफिस फोन की घंटी बजाई और आदतन मैंने कहा "मैंने लंच कर लिया है अच्छा था आप भी कर लो " वाइफ ने बात अनसुना करते कहा "आज कबूतर बहुत परेशान कर रहें हैं , दाना पानी तो लेते नहीं अलबत्ता मुझे दिखा दिखा कर तिनके बालकनी में इधर उधर गिरा रहें हैं। क्या करूँ , कितनी बार ब्रूमिंग करें। "
फोन पर मैंने कहा कोई बात नहीं आज कल में ये कबूतर अपना ठिकाना कहीं और कर लेंगे , जल्दी ही वे तुम्हारा इरादा समझ जायेंगे। कह कर मैंने वाइफ को शांत किया।

अभी शाम को मैं घर पहुंचा आफिस का बैग वाइफ ने पकड़ते हुए एक बड़ी साँस लेकर कहा जानते हैं कबूतरों ने अंडे बालकनी में ही दे दिए , गमले के ऊपर , मुलायम -भुर भुरी मिट्टी , सूखे पत्तों के ऊपर ही  ,वो अपनी बात पूरी करती की , मैंने कहा - "चलो अच्छा हुआ अंडे फेको छुट्टी मिली।" वाइफ ने मुझे देखा ,फिर अचानक चुप हो , रैक में आफिस बैग रख ,वह किचन की ओर चल पड़ी।

चाय की टेबल पर एक निस्तब्भता छाई थी एक चुप सबके ऊपर लगा था जैसे आज कोई विषय नहीं मिल रहा चाय -चर्चा के लिए। शाम की चाय कई मायनों में अपने महत्त्व को रेखांकित करती है , सुबह की जल्द बादी - दफ्तर - स्कूल / कालेज जाने की आपाधापी के बीच मुहं में डाली गयी चाय और नाश्ते की तुलना में यह बेहद प्रेम और सकून इत्मीनान के पलों को देती है।
मैंने वाइफ को देखते हुए चाय की सिप ली , मेरी मंशा को देख , चुप्पी टूटी। "आओ आपको दिखाती हूँ कबूतर के अंडे , बिलकुल सफ़ेद -सुन्दर -इश्वर का करिश्मा हो जैसे " मेरा हाथ पकड़ बालकनी के ग्रिल डोर तक पहुँच कर लगभग फुसफुसाते बोली "आवाज मत कीजिये , अंडे के अन्दर चूजे का विकास डिस्टर्ब होगा " मैंने देखा गमले के ऊपर मुलायम -भुर भुरी मिट्टीके ऊपर  , सूखे पत्तों की तह पर दो अंडे करीने से रक्खे थे। वापस कमरे आकर , बालकनी जाने वाली ग्रिल डोर और वुड डोर को आहिस्ता से बंद कर वाइफ बोली "देखिये अंडे फेकना पाप होगा , कबूतर के लिए यह भ्रूण हत्या से कम नहीं "
रात भर वाइफ ने जिस बेचैनी से कबूतर के अंडे की सुरक्षा की यह आश्चर्य से कम न था आज सुबह तक वह जिस प्रयास से कबूतरों को बालकनी से दूर भगाने को लगी पड़ी थी उसके विपरीत उनका यह व्यवहार अदभुत था।

तडके सुबह वाइफ ने कहा की उसने स्टील अलमारी के नीचे तली में कबूतरों के प्रवेश को रोकने के लिए जो ईंटे लगाई थी वह हटा दीं हैं , कूड़े दान में फेंके गए घोसले को वह कूड़े दान से उठा लाई है , उसने कहा की अभी अँधेरा सा है मैं डिटाल से अपने हाथों को अच्छी तरह साफ करके ,अण्डों को अहिस्ता से घोसले के कुशन पर रख दूँ बिना किसी नुकसान के ताकि अंडे में रहने वाली छोटी सी जान को कुछ भी न हो।

मैं अंडो को उस घोसले सहित स्टील एलमिरा की तली में खिसका रहा था और देख रहा था वाइफ के चेहरे के उस सकून को जो सिर्फ माँ के चेहरे पर ही दिखाई पड़ता है. एक माँ ही दूसरी माँ के ममत्व की पीड़ा का एहसास कर सकती है उसे ही शायद अनुभव है पेट में पलते शिशु और जन्म देने वाली माँ के मनोभाव ,अनभूति और एहसास की संरचना का ।

उड़कू बैठ कर ,घोसले को तली के भीतर सुरक्षित कर मैं जैसे ही सीधा हुआ तभी फड़ फड़ा ते हुए एक कबूतर मेरे सामने स्टील एलमिरा की तली में प्रवेश कर गया और बालकनी की मुंडेर पर बैठा दूसरा कबूतर हमें देख कर माँ की ममता पर उपकार के लिए बड़ी मासूमियत से मुझे अपने ह्रदय की कृतज्ञता प्रकट कर रहा था। और मैं प्रातः उग रहे सूरज की रोशनी में प्राणी जगत के अन्दर विद्यमान स्वर्ग जैसे ममत्व की कायनात से अभिभूत हो रहा था।

- अवधेश सिंह
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