जिंदिगी सिर्फ कविता तो नहीं


जिंदिगी के संबंध में हर व्यक्ति का अलग अलग नजरिया हो सकता है लेकिन यह सच है की मिठास और तीखे पन के अस्वाद सभी के एक ही रहते हैं । ऊपरी लिबास में हो सकता है की हमारी पहचान अलग दिखे , हमारी भाषा और बोलने के तरीके अलग हों लेकिन शरीर की संरचना और भाव अनुभूति एक ही है। रास्ते अलग हों पर मंजिल सबकी एक ही तो है ।  

जीवन और कविता का संबंध संवेदना के संबंध हो सकते हैं ,शब्दों के शिल्प से जीवन की कई मूर्तियाँ बन सकती हैं कदाचित इसीलिए  भावुकता के पैमाने पर अनुभूतियों से जीवन की नाप जोख भी की जा सकती है । इसी का परिणाम वह बड़े बड़े ग्रंथ - काव्य आदि हैं जिनमे जीवन और जीवन से जुड़ी अनेकोनेक घटनाएँ हैं, और लेखक रचनाकर जीवन ही नहीं गढ़ता बल्कि एक संसार बना देता है ।

"जिंदगी सिर्फ कविता तो नहीं" में जीवन की कठोर सच्चाई को स्वीकारते हुए , जीवन को उकेरने वाले सभी कृतियों के शब्द शिल्प और वाक्य संरचना की कठोरता को समतल करने का प्रयास किया है ,

इस कविता के माध्यम जीवन को मिठास का पर्याय मानते हुए जीवन का दर्शन किया गया है - अवधेश सिंह


 

जिंदगी सिर्फ कविता तो नहीं

1 .

जिंदगी सिर्फ 
कविता तो नहीं  
वर्ना मैं इसको सजाता 
उन कोमल
अनछुए शब्दों से 
जिन्हें कदाचित
इस दुनिया की
हवा तक ने
स्पर्श न किया हो

जिंदगी सिर्फ 
कविता तो नहीं
वर्ना अलंकृत करता 
इस कविता नुमा जिंदिगी को  
उन वाक्य विन्यासों से 
जिसमे निराशा का 
भाव न होता 
करिश्माओं का
आभाव न होता

2 .

जिंदगी कविता हो सकती 
ऐसा काश होता 
शब्दों के चयन में 
"न" शब्द  होता ही नहीं 
जमीं "हाँ" की होती 
"हाँ" का ही विस्तृत 
आकाश होता

मेरे चयनित

शब्दों से आग 
भाग जाती 
इर्ष्या की तपन 
जमींदोज हो जाती  

शीतल मनोरम 

हरियाली पुष्प गुच्छों 
के बीच 
शब्द बरसते 
रिमझिम बारिश से

मेरी यह कविता 

टापुर टिपर टापुर टिपर
का मधुर संगीत सुनाती


3 .

जिंदगी कविता तो नहीं 
यदि ये कविता हो जाती 
शब्दों की नाव बना 
मैं पार करता 
सात समुद्रों को

शब्दों के मखमली 
बहु रंगी पंखों से मैं 
सतरंगी इन्द्रधनुष
के ऊपर 
छितिज के उस पार
तक की परवाज करता 
कर देता 
आकाश को आर पार

4 .

जिंदगी काश कविता होती 
हाशिये पर न 
जा पाते खुशियों के पल 
शब्दों से 
गढ़ देता उल्लास

कठोर ह्रदय में भरता

प्रेम तरल  

आस्था के 
अनुभूति के 
नए पुनर्नवा आकार

होते सभी के लिए 

अति सुलभ सरल  

 

 5 .

 कविता यदि

जिंदगी बन सकती

मैं सिमटने नहीं देता 
अवसाद को

ख़ामोशी में 
कर देता उक्त शब्दों को 
शब्द कोष के बाहर


काली सूची में डालता 
पलकों को गीला करने वाले 
कुटिल वाक्यों को


मैं छांट कर

उन शब्दों को 
हरी दूब पर 
बिखरा देता 
जिन शब्दों में 
बसते हैं प्यार - दुलार 
जिनमे सामर्थ्य है 
जोड़ कर रखने का 
जो जोड़ देते हैं 
टूटते बिखरते

संजीदा सरोकार

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