प्रेम कविता - वजह love poetry by awadhesh singh

चिड़िया बहुत आज है प्यासी poetry by awadhesh singh thirsty bird

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मेरी अनुभूतियाँ  - अवधेश सिंह

      शब्द सृजन  


 

पर्यावरण उवाच : पृथ्वी दिवस पर पृथ्वी दिवस पर पर्यावरण उवाच : सूरज से पूछ बैठा था मैं /पर्यावरण पर कुछ बुनियादी सवाल /क्षण में बदल गए उसके सुर ताल /पर्यावरण के मुददे पर /सूरज ने काटा फिर /देर शाम तक बड़ा बवाल.....


 

मैं कविता लिखता हूँ
तुम कविता बनाती हो।मैं कविता लिखता हूँ
तुम कविता बनाती हो।

दरअसल कविता/ शब्द दर शब्द अनुभूति का प्रवाह है/

जिसे मैं कागज पर लिखता हूँ बस/
कविता बनाना वैसा ही है/ जैसे मन को बनाना
बिना मन को तैयार किए/ कविता चल नहीं सकती
कलम कोरे कागज पर / फिसल नहीं सकती
बेमन लिखी हुई कविता /लंगड़ी –लूली अपंग हो
रचना मेरी बिना रूप रंग हो /
यह तुम सह नहीं पाती हो/
अर्धांगनी होने का रिश्ता निभाती हो/
तुम ही तो मेरा मन बनाती हो/
तभी मैं कहता हूँ, मैं कविता लिखता हूँ
तुम कविता बनाती हो।


 अन्य प्रकाशित रचनाएँ :

सब्र और संकल्प – अवधेश सिंह

 अवधेश सिंह की कविताएँ

पर्यावरण पर कविताएँ – अवधेश सिंह

मेरे बच्चे - मदर डे पर एक बड़ी कविता 

  कहानी     


 

कथा : ईमानदारी की कुल्हाड़ी- अवधेश सिंहनए संदर्भ में पुरानी कथा : ईमानदारी की कुल्हाड़ी-"निराशा , बेबसी  और उदासी ने लकडहारे को घोर संकट में डाल दिया था, एक तो कुल्हाड़ी का नुकसान दूसरा लकड़ी का छोटे ढेर जिस से उसकी आवश्यकतायें पूरी जो नहीं होनी थी। उसकी रोजी रोटी का एकमात्र साधन जुटाने वाली कुल्हाड़ी नदी की गहराइयों में खो चुकी थी, उसके आँखों से अश्रुधारा अनायास ही  बह चली, बाजार में वर्तमान की महगाई के चलते तमाम उधार देनदारियों के कारण उसे आज राशन के जुगाड़ के न होने का भी भय था , घर पर होने वाले कोहराम के डर से भी वह भय भीत हो चला था।...


 

एक भावपूर्ण कहानी : ममत्व - अवधेश सिंह

कहानी - ममत्व .....  रात भर वाइफ ने जिस बेचैनी से कबूतर के अंडे की सुरक्षा की यह आश्चर्य से कम न था आज सुबह तक वह जिस प्रयास से कबूतरों को बालकनी से दूर भगाने को लगी पड़ी थी उसके विपरीत उनका यह व्यवहार अदभुत था।

तडके सुबह वाइफ ने कहा की उसने स्टील अलमारी के नीचे तली में कबूतरों के प्रवेश को रोकने के लिए जो ईंटे लगाई थी वह हटा दीं हैं , कूड़े दान में फेंके गए घोसले को वह कूड़े दान से उठा लाई है , उसने कहा की अभी अँधेरा सा है मैं डिटाल से अपने हाथों को अच्छी तरह साफ करके ,अण्डों को अहिस्ता से घोसले के कुशन पर रख दूँ बिना किसी नुकसान के ताकि अंडे में रहने वाली छोटी सी जान को कुछ भी न हो।


 

 हास्य - व्यंग

 

गीत -नवगीत

बेबाक बात 


 

बेबाक बात : मनीष कुमार सिंह कहानी संग्रह-“वामन अवतार” पर

कहानीकार  मनीष कुमार सिंह से बेबाक बात : 

...हम जो कहना चाहते हैं इस पर निर्भर है। कहीं पर यह सब कुछ खत्म हो जाने के बाद भी कुछ बचा लेने की कोशिश को दर्शाना है तो कहीं यह घनघोर यथार्थ के मध्य आदर्श की न्यून  ही सही मगर सार्थक उपस्थिति को प्रस्तुत  करना है। कभी-कभी गलत प्रवृत्तियॉ अत्यंत शक्तिशाली होने के बाद भी हार जाती हैं। पिछले दिनों कई ताकतवर लोगों का जो हाल हुआ वह इसका एक उदाहरण है।... 

   


" हिंदी पखवारा " बेचारा हिंदी अधिकारी  - अवधेश सिंह

    " हिंदी पखवारा " बेचारा हिंदी अधिकारी  - अवधेश सिंह  कार्यक्रम में सभी विभागों के प्रतिनिधित्व के बाद भी यह हिंदी पखवारा कार्यक्रम ऐसा लगता है जैसे किसी यतीम का जन्म दिन............." एक वर्ग इसमें अपनी गंभीर लगन दर्शाता है पर असली माई बाप कौन यह नहींपता लगता, हर व्यक्ति इस व्यवस्था के साथ जुड़ कर भी अलग अलहदा दिखाई पड़ता है और जिम्मेदारी के सवाल पर बस एक ही व्यक्ति पकड़ में आता है , वह है हिंदी अधिकारी.
और उस एक हिंदी अधिकारी से ज्यादा इस बात की पीड़ा और कौन समझ सकता है। 

 


प्रेम कविताओं के संग्रह छूना बस मन से