ब्रजेन्द्र त्रिपाठी की पुस्तक ‘साहित्य और परिवेश’ का लोकार्पण संपन्न

" पुस्तक में संकलित  विषय इतने विविध  और महत्वपूर्ण हैं  कि उस पर अलग से कई पुस्तकें लिखी जा सकती हैं।  यह पुस्तक संक्षेप में साहित्य के विभिन्न पक्षों पर अपने मंतव्य व्यक्त करने का  सफल प्रयास  है। यह बात विगत दिनों 26 अगस्त 2013 को साहित्य अकादेमी के सभागार में श्री ब्रजेन्द्र त्रिपाठी की गद्य पुस्तक ‘साहित्य एवं परिवेश’    का लोकार्पण समारोह के अध्यक्ष श्री  विश्वनाथ   प्रसाद तिवारी ने अपने उद्बोधन में स्पस्ट किये ,  वसुधैव कुटुम्बकम् व भूमंडलीकरण के बीच के   अंतर को स्पष्ट करते हुए श्री तिवारी  कहा  कि  भूमंडलीकरण के चलते हमारी संस्कृति, साहित्य   पर प्रबल संकट    का दौर है तब  भारतीय साहित्य और   अपनी संस्कृति से जुड़े पहलुओं पर बात करना साहित्य के हक़ में अच्छी बात है।

26 अगस्त 2013 को साहित्य अकादेमी के सभागार में श्री ब्रजेन्द्र त्रिपाठी की गद्य पुस्तक ‘साहित्य एवं परिवेश’ का लोकार्पण मुख्य वक्ता अजय तिवारी ने कहा कि बिना किसी महत्त्वाकांक्षा के लिखी गई   यह पुस्तक महत्त्वपूर्ण है, लेकिन इसमें   कई जगह   विवाद से बचने के लिए तथ्यों से बचा गया है जो ठीक नहीं है। ये निबंध ‘विमर्श’ की श्रेणी में भले न परिगणित की जाए तथापि लेखक ने विभिन्न विषयों  पर समावेशी दृष्टी डाली है।   उन्होंने कहा कि बिना पूर्वग्रहों के कोई आलोचक नहीं हो सकता। उस अर्थ में ब्रजेन्द्र त्रिपाठी के भी अपने पूर्वग्रह हैं और उस सीमा तक वे सम्यक् आलोचक हैं।   प्रो. अजय तिवारी ने कहा कि कोई भी लेखक यथार्थ से मुँह चुराकर संस्कृति का विवेचक नहीं हो सकता और   यथार्थ किन-किन स्तरों पर किताब में मौजूद है,   वह  इनके निबंधों में स्पष्टतः दृष्टीगत होता है।
विशिष्ट  वक्ता के रूप में ज्योतिष जोशी ने   कहा कि त्रिपाठी जी की   यह किताब बिना किसी वैचारिक   चोला ओढ़े  भारतीय संस्कृति की मनीशा को साझा करती है तथा वे एक उत्कृष्ट निबंधकार के   रूप में सामने आते हैं।    इसमें भारतीय संस्कृति के क्षरण पर गहरी   चिंता प्रकट की गई है। मुख्य वक्ता के रूप में जितेन्द्र श्रीवास्तव ने कहा    कि उनकी पूरी किताब भारतीयता की खोज है और यह उनके यहाँ सीमित दायरे में नहीं,   बल्कि व्यापक रूप में सामने आती है। वे साहित्य में एकता के बिंदुओं की खोज करते हैं।
नीरज कुमार ने कहा कि त्रिपाठी जी ने अपने विमर्श की सीमाएँ पहचानी है और उससे बाहर निकलने का प्रयास नहीं किया है।    वे कहीं भी ‘पोलेमिकल’ होने से बचते हैं। यह उनकी सीमा है, किन्तु वे अपने पक्ष को साफ़ तौर पर पहचानते हैं। वे विचार- विमर्श तो करते हैं पर विमर्श यानी डिस्कोर्स में जाने से बचते हैं।
वरिष्ठ साहित्यकारों की शानदार उपस्थिति के मध्य संपन्न यह लोकार्पण समारोह में  साहित्य अकादेमी के   सचिव श्री के. श्रीनिवासराव, अजित कुमार,  रमणिका गुप्ता, नरेन्द्र मोहन, बलदेव वंशी, प्रेम जनमेजय,  दिविक रमेश, अवधेश सिंह , दिनेश मिश्र, प्रदीप पंत, सुधेश, वीरेन्द्र सक्सेना, देवेन्द्र चैबे, बलराम, लीना मल्होत्रा राव,  अनुभूति चतुर्वेदी, सुधा उपाध्याय, रवीन्द्र त्रिपाठी, रणजीत साहा आदि लेखक भारी संख्या में मौजूद थे। कार्यक्रम का संचालन ओम निष्चल ने किया। पुस्तक का प्रकाशन यश पब्लिकेशस, दिल्ली ने किया है। -प्रस्तुति - अनीता सिंह