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 राजधानी के रूसी विज्ञान एवं संस्कृति केंद्र में18 मार्च,  2014 को अलका सिन्हा एवं मनोज सिन्हा को सहचर सम्मान


ऐसा नहीं की भौतिकता की अंधी दौड़ के पहले बाहरी श्रम उपार्जन में महिलाओं की भागीदारी पुरुष के साथ नहीं होती थी , ऐसा नहीं की महिलाएं पहले जीवन की रचनात्मकता में व्यक्तिगत लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए पति पुरुष का सहयोग नहीं प्राप्त कर पाती थी। स्त्री पुरुष दाम्पत्य जीवन के हर उतार चढ़ाव में एक दूसरे के पूरक और प्रेरक रहें है , रहते हैं और रहेंगे ।इतिहास गवाह है, एक नहीं असंख्य उदाहरण हैं जब दंपति युगल द्वारा समाज में नए उत्कर्ष स्थापित हुए हैं जिसमें महिला के व्यक्तिगत विकास में पति पुरुष ने अपना समस्त सहयोग दिया है और वहीं पुरुष के व्यक्तिगत उत्थान में महिला ने , शायद इसलिए समाज पहले भी इनको मान्यता देता था और अब भी ।

 

परिचय संस्था का सहचर सम्मान 2014

रिचय   साहित्य परिषद के 27 वें वार्षिक  उत्सव के  अवसर पर राजधानी के रूसी विज्ञान एवं संस्कृति केंद्र में18 मार्च,  2014 को होली की खुमारी में  रची-बसी वह  शाम तब यादगार बन गयी जब भाषाविद्, हिंदी सेवी,   भारत सरकार के संस्कृति  मंत्रालय में सहायक निदेशक के रूप में कार्यरत  श्री  मनोज सिन्हा (मनु) और हिंदी की प्रख्यात कवयित्री-कथाकार श्रीमती अलका सिन्हा को ‘सहचर सम्मान-2014’ से सम्मानित किया गया इससे पूर्व यह सम्मान हिंदी के सुप्रसिद्ध कवि राही दंपत्ति   (बालस्वरूप राही और पुष्पा राही) तथा वाजपेयी दंपत्ति (लक्ष्मीशंकर वाजपेयी और ममता किरण) को प्रदान किया जा चुका है|   सम्मानित लेखक दंपत्ति श्रृंखला की तीसरी कड़ी में सिन्हा दंपत्ति    (अलका सिन्हा एवं मनोज सिन्हा)    को परिवार, समाज और साहित्य को सुदृढ़ करने के लिए केंद्रीय हिंदी निदेशालय के निदेशक और वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग के अध्यक्ष    डॉ. केशरी लाल वर्मा के हाथों यह सम्मान प्रदान किया गया|  

परिचय संस्था द्वारा श्री मनु सिन्हा को सहचर सम्मान 2014

इस अवसर पर मनोज सिन्हा ने अपने भावों की अभिव्यक्ति कुछ इस अंदाज़ में दी–

तेरी शोहरत की कथा, और हुस्न के गीत

मैं तो भोला बावरा, मैं बस जानूं प्रीत

स्त्री की तथाकथित अस्मिता को अपने सहचर के प्रति प्रेम और समर्पण में घोलते हुए  अलका सिन्हा का अंदाज-ए-बयां उपस्थित   श्रोताओं  के  दिलों में कुछ यूँ उतरा –

ज़िंदगी ने जो दिया सब मीत तेरे नाम

हर्ष के संघर्ष के सब गीत तेरे नाम |

इस अवसर पर बोलते हुए विभिन्न वक्ताओं ने कहा कि साहित्य जगत में सुपरिचित इस दंपत्ति ने पिछले 2 दशकों से भी ज्यादा समय से हिंदी की क्यारी में अपने समय, ऊर्जा और रचनात्मकता से नए रंग भरे हैं और इन्हें खुशबू दी है।     हिंदी परिवार के अभिन्न अंग, अलका-मनु की इस भाषा-साहित्य यात्रा ने कई संस्थाओं जैसे परिचय, अक्षरम आदि को रस प्राण दिए हैं।   इन्होंने भाषा और साहित्य को ही जीवन में ओढ़ा और बिछाया है।    इस अवसर पर साहित्यिक  संस्था ‘अक्षरम’ की ओर से अनिल जोशी तथा परिचय साहित्य परिषद की ओर से   उर्मिल सत्यभूषण, अनिल वर्मा मीत और रवि ऋषि सहित उपस्थित अनेक   लेखकों-रचनाकारों ने सम्मानित दंपत्ति को बधाई और शुभकामनाएं दीं |