पुस्तक मिली 


 

नवगीत विधा पर स्वीकारोक्ति व नवगीत काव्य धारा की धुरंधरी पर एक धुर प्रयास

 गीत से नवगीत तक की काव्य – यात्रा केवल छंद रचना की अभिव्यक्ति नहीं हैं बल्कि यह सम्पूर्ण भाव की समुचित रचना धर्मिता है। समस्त रस व भाव को आत्मसात कर नवगीत का सृजन करना और उसे वर्तमान की कसौटी पर खरा साबित करना अपने आप में एक बड़ी रचनात्मक सफलता है। एक दशक पूर्व 1998 में श्री वीरेन्द्र आस्तिक की पहली पुस्तक  ” धार पर हम ” में रचना धर्मिता के साथ तात्कालिक परिवेश की धार पर चलने वाले सोलह चर्चित नवगीतकारों की रचनाओं का संकलन प्रकाशित हुआ था। इस प्रथम खंड पर नवगीत धारा की धार के  प्रदर्शन में जहाँ एक ओर आस्तिक जी का विस्तृत रास्ट्रीय पटल पर जाँच परख का विचार मंथन था वहीँ 2011 में प्रकाशित इस दितीय खंड में नवगीत की व्यापकता पर समर्थन जुटाने का भागीरथी प्रयास झलकता है ।इन दोनों साहित्यक दस्तावेजों को आने वाला हिंदी साहित्य का इतिहास एक धरोहर के रूप में अवश्य देखेगा ऐसा मेरा मानना है।

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 इतना तो तय है की नई कविता के सभी तेवर नव गीत विधा में अपनी उच्चता के साथ प्रकट हो रहें हैं। यह उन लोगों को संतुष्ट करने के लिए पर्याप्त हैं जिनकी आलोचनाओं के केंद्र में नवगीत विधा गुजर रही थी , एक बानगी राम सेंगर , प्रष्ठ -93 पर देखें -

है मजाक कितना यह गन्दा

जिसको देखा फूल रहें हैं

खा – खाकर जनहित का चंदा ।

चारागाह है देश समूचा

है स्वच्छंद यहाँ चौपाये

अंधा पीसे

कुत्ता खाए

गीत और नवगीत को , नयी कविता की धरातल पर रख कर उसकी विशिष्टता और अति विशिष्टता को प्रमाणित करने की चेष्टा और वर्तमान के नए रचनाकारों व पुराने साहित्यकारों का तुलनात्मक अध्यन करने का कार्य  आलोचकों को नए निवाले उपलब्ध कराने जैसा लग रहा है। जब हम श्रेष्ठता व उच्च कोटिता व उसके वर्तमान मूल्य को देखें तो हमें धूलखाती साहित्यक पुस्तकों और दीमक का ग्रास बनी पांडुलिपियों की आत्मा की आवाज सुननी होगी।  हमें देखना होगा की वह कौन सी रेखा है जिसको पार कर,” तलवार की धार” पर स्वयं को रखने वाला साहित्यक विचार धारा असाहित्यक असहिष्णु  प्रपंच जनों के महा मंडल से पार पा सके और उन्मुक्त हो नव गीत , नयी कविता आदि का नैसर्गिक सृजन कर सके।

मुद्ददों की बात करें या स्वस्थ हस्तछेप पर अपनी नजर डालें तो हम पाएंगे की एक रिक्तता, एक खालीपन का एहसास साहित्य की हर विधा में विद्यमान है जब तक पाठक हमें खरीद कर नहीं पढता , जब तक हमारे गीतों को कोई राह चलते नहीं गुनगुनाते तब तक साहित्यकारों की मंडली और उनमे श्रेष्ठता व वर्चस्वता पर हो रहे निरर्थक वाद विवाद    हमें “निर्वात – शून्यता” की दहलीज की और धकेल रहें हैं।

ऐसे में  भूमंडल और  व्यापारिक -  उपभोक्ता संस्कृति  के पटल  में इसको मान्यता  दिलाना एक महत्वपूर्ण कार्य है, जिस पर शायद अभी  शुरुआत की दरकार है  ताकि खंड एक [1998 ]  से चल कर खंड – दो [ 2011] तक में वीरेन्द्र आस्तिक ने नवगीत विधा और उसकी साहित्यक समग्रता का जो दीपक  प्रज्ज्वलित किया है  उसका प्रकाश व्यापक रूप से फ़ैल सके और साहित्यक मूल्यों को नए मूल्यांकन की बाट न जोहनी पड़े और उसकी सही सही समुचित परख हो सके।

पुस्तक: धार पर हम (दो), लेखक: वीरेन्द्र आस्तिक, मूल्य: 395 रु, प्रकाशक: कल्पना प्रकाशन, दिल्ली

 अवधेश सिंह [लेखक स्वतंत्र टिप्पणिकार, कला व साहित्यिक समीक्षक हैं ]