पुस्तक मिली 


 

पुस्तक चर्चा : अरविन्द श्रीवास्तव की कविताओं का संग्रह "राजधानी में एक उजबेक लड़की "

book review by awadhesh singh

मित्र देवेन्द्र देवेश ने जब मुझे अपनी संपादकीय त्रैमासिक पत्रिका संवादिया के साथ अरविन्द श्रीवास्तव की पुस्तक "राजधानी में एक उजबेक लड़की " को मेरी व्यक्तिगत लाइब्रेरी हेतु प्रदान की तो पहली नजर में मुझे लगा की यह एक विदेशी लड़की से सम्बंधित कविता का संग्रह है , लेखक के परिचय को जाने पढ़े बिना , संग्रह की भूमिका को पढ़े बिना सीधे पुस्तक की रचनाओं को पढने की अपनी आदत के अनुसार जब मैंने अरविन्द श्रीवास्तव की पुस्तक "राजधानी में एक उजबेक लड़की " को पढ़ा तो मुझे यह संग्रह इतना अति गहराई से उपजी वेदना का दस्तावेज जैसा लगने लगा कि, उसी समय मैंने मोबाईल पर लेखक से लम्बी वार्ता की.

अरविन्द श्रीवास्तव की पुस्तक "राजधानी में एक उजबेक लड़की " कवि की वह अंतर्खोज की व्यथा - कथा है जिसमें घोर अँधेरे में उजालों को पकड़ने का प्रयास किया गया है। मरघट में बैठ कर जीवन के स्पंदन की अनुभूति , घोर निराशा के पलों में, उससे भी अति निराशा के पलों से न पीड़ित होने की सुखानुभूति में रची बसी उनकी कवितायेँ एक ओर बोझिल मन को संसार के तमाम बोझों के सामने हल्का फुल्का करती दिखाई देती हैं और दूसरी ओर कातिल से आँख मिलाने का सामर्थ्य प्रदान करती हैं। यह संग्रह एक शक्ति हीन - दीन -दुखियारे व्यक्ति की आत्म कथा सी लगने लगती है जब कवि इश्वर द्वारा प्रदत्त नैसर्गिक ताकत को अनदेखा करते हुए संदेहों , बुरे सपनो , जटिल वास्तविकताओं के धरातल में सब कुछ सत्यम शिवम् सुन्दरम सा हो इसके लिए प्रार्थना करता है

यश पब्लिकेशन दिल्ली से 2012 को प्रकाशित यह काव्य संग्रह उज्बेकिस्तानी चित्रकार तिमुर आख्मेदोव के प्रशिद्ध चित्र को संग्रह शीर्षक"राजधानी में एक उजबेक लड़की " के साथ जोड़ कर प्रस्तुत किया गया है . संग्रह की पहली कविता " एक डरी और सहमी दुनिया " पेज 9 ,  से संग्रह की भूमिका स्पस्ट होती है जिसमे कवि काले सायों , बुरी आत्माओं से खुद को बचाने के लिए प्रार्थना को अचूक अस्त्र के रूप में देखता है .

इसी संग्रह में " एक नवजात की शव यात्रा " की लाइने    -"अभी छीनने थे कसाई हाथों से खंजर और खोलने थे बंदी गृह के ताले..." [पेज 1 5 ] जीवन में आने वाले अनंत संभावनाओं , सुनहरे भविष्य अवसादों को दफ़न होते दिखाती हैं ।   सामाजिक व्यवस्था में आम आदमी की दुशवारियाँ को व्यक्त कर सिस्टम की खिल्ली उड़ाती कविता " बंद नाक "[पेज1 6 ] , लोकतान्त्रिक व्यवस्था पर एक सटीक चुटकी है

वहीँ घर का बोझ गधे की तरह ढोते बन्दे की होशियारी यह है की वह खुद को अस्तबल का रखवाला समझ बैठता है उसे उसके परिवार के जन गाय बकरी जैसे लगने लगते हैं. कविता "चतुराई" [पेज 17] शायद यही कहती है। कवि पुनः आतंक , बहशी पन , क्रूर मंशाएं , जहालत , आपाधापी , गुत्थम गुत्था , लहू , खुंरेजी , शंकाएं , दुविधाएं , परास्त ,

 

हार निराशा को समय के साथ रख कर खुद को इसके प्रभाव से मुक्त रखते हुए अपनी कविता "मजे में हैं सारे" -पेज 20 से प्रकृति की भौतिकता सामाजिक परिद्रश्य की आवश्यक व महत्वपूर्ण घटक , भाव रस के प्रति उद्दिग्नता घोर निराशा अँधेरे को सलाम ठोकता हुआ लगता है . कवि कई बार उजाले से ज्यादा उसके उजास से भयभीत है उजाले के बाद आने वाले अँधेरे के प्रहार से भयभीत कविता " सांकल " [ पेज 21 ] उस अँधेरे को कोठारी में बंद रखने की कविता है

 

book review by awadhesh singh

प्रकाश में अँधेरा देखने की ललक , ख़ुशी में दुःख तलाशने की प्रवृति , उल्लास में अवसाद खोजने की सरगर्मी से लिप्त "खबरिया " कविता [पेज 22 ] पर है . गम की गिरफ्त में जीत के कौतुहल से अनभिज्ञता बरतते हुए प्रेम की पराकाष्ठा में पौरष व पराजय के उलट विचारों की अभिव्यक्ति व अनुभूति का स्पंदन है " देह के अन्दर देह और साँस के अन्दर साँस [ पेज -26 ] . रचना " गुस्सा भरा समय" [ पेज 40 ] - द्रश्य चित्र है जिधर कवि संकीर्णता संकोच मानसिक नपुंसकता का शिकार हो जाता है .

 

नकारात्मक सोंच को उद्दीप्त करती , उजाले की तलाश में अँधेरे घरों को जाती राह खोजती , डर और दहशत की जंजीरों में खुद को जन्म जात कैदी मान कर जिंदिगी को सांसो के कर्ज दार के रूप में देखती परखती अरविन्द जी के इस कविता संग्रह का पाठक , लेखक के चश्मे से दुनिया देख कर कितना संतुष्ट होगा यह अभी समय के गर्त में है लेकिन भाव अनुभूति व शिल्प की नजर में संग्रह रोचक है

- अवधेश सिंह [ एक जाने माने कवि - लेखक - समीक्षक ]