बेईमानी और भ्रष्टाचार:
भाग -1
बेईमानी क्यों हो जाती है नौकरशाही , डॉ. हरदेव सिंह पूर्व अधिकारी प्रादेशिक सिविल सर्विस उत्तर प्रदेश  की किताब मैंने इसलिए नहीं पढ़ी की यह किताब बेईमानी और नौकरशाही के बीच बनने वाले रिश्तों पर प्रकाश डालती है और उनके कारक व उत्प्रेरक पर फोकस करने का प्रयास करती है बेईमान क्यों हो जाती है नौकरशाही , डॉ. हरदेव सिंह पूर्व अधिकारी प्रादेशिक सिविल सर्विस उत्तर प्रदेश की किताब मैंने इसलिए नहीं पढ़ी की यह किताब बेईमानी और नौकरशाही के बीच बनने वाले रिश्तों पर प्रकाश डालती है और उनके कारक व उत्प्रेरक पर फोकस करने का प्रयास करती है बल्कि 2006 में वाणी प्रकाशन नयी दिल्ली से प्रकाशित यह किताब मैंने इसलिए पढ़ी क्यों की इसका लेखक वर्तमान में नवोदित राजनैतिक दल ‘आप’ के सक्रिय सदस्य हैं और मैनपुरी उत्तर प्रदेश से इसी दल के  लोकसभा प्रत्याशी हैं तथा मौजूदा वक्त बाबा हरदेव के नए नाम से खुद को प्रस्तुत कर रहे हैं , आप की सटीक पड़ताल के लिए इसका पढ़ना आवश्यक लग रहा था ।
मैं सदकर्म या ईमानदारी को एक आईने के रूप में देखता हूँ । बेईमानी और भ्रष्टाचार उस आईने पर पड़ने वाली धूल और गर्द है जिसके कारण आईना धुंधला ,गंदा हो जाता है और उसमें प्रतिबिब भी वैसा ही दिखता है, अच्छी भली सूरत खराब नजर आती है ।

यह आईना अपना धर्म,कर्म,कर्तव्य,ज़िम्मेदारी और व्यवहार किसी भी रूप में लिया जा सकता है । यहाँ धूल और गर्द वातावरण में व्याप्त काम, क्रोध,लोभ व मोह जनित कोई भी कारक /उत्प्रेरक हो सकता है । बेईमानी और भ्रष्टाचार की धूल से आईने को सुरक्षित रखने के तीन उपाय है – पहला, आईने से रोजाना धूल और गर्द को नियमानुसार हटाया जाए। दूसरा आईने को मोटे कपड़े से ढक दिया जाए और अंतिम तीसरा उपाय है की परिवेश या वातावरण को धूल गर्द रहित रक्खा जाए ।


पहला उपाय वस्तुतः सभी जगह अपनाया जा रहा है और नौकर शाही की पहली ज़िम्मेदारी यही है इनके कारकों से निपटे । निपटने के सभी उपकरण –उपष्कर –विधियाँ – नियम उप नियम आदि न्यायपालिका के मोटे डंडे द्वारा विधायिका के घेरे में , कानून के अंकुश तले हमेशा से मौजूद रहें है । मुझे मेरी 30 वर्ष की सेवा के दौरान जहां मैंने भारतीय सूचना सेवा के वरिष्ठ अधिकारी के रूप में लगभग 6 वर्ष काम किया । सरकारी मीडिया के सभी विभागों की संबद्धता के साथ सूचना प्रसारण मंत्रालय भारत सरकार की कार्य प्रणाली को बहुत नजदीक से जाना समझा और इससे संबन्धित अपनी भागीदारी भी निभाई । बाकी वक्त दूरसंचार विभाग के योजना ,प्रशासन , मानव संसाधन,वाणिज्यक,तकनीकी संस्थापन , तकनीकी रखरखाव, विक्रय –विपणन आदि के अधिकारी के रूप में कार्य करते हुए गुजार रहा हूँ ।

मेरा हमेशा से एक ही पुख्ता विचार रहा है, वह यह की किसी भी स्तर के अधिकारी को कार्य संबंधी अपडेट के लिए अध्यन शीलता और विभागीय ट्रेनिग को, दिनचर्या में शामिल करना चाहिए और विवेकाधीन मसलों पर मौजूदा सहयोगियों से चर्चा और नियमों की अनुकूलता के आधार निर्णय लेना चाहिए । दरअसल आईने से धूल और गर्द हटाने का यह पहला उपाय अधिकांश अधिकारियों के द्वारा उक्त सोंच को न विकसित करने के कारण अपनी उपयोगिता खोता जा रहा है जिसके लिए नौकरशाही को सीधे अपनी हार को स्वीकार करना चाहिए ।

मुझे आश्चर्य है की इन उपायों की संक्षिप्त चर्चा भी करना डॉ हरदेव सिंह को मुनासिब नहीं लगा ।
इसमें दो राय नहीं की मनोविज्ञान और दर्शन शास्त्र विषय पर अपनी पकड़ का अधिकाधिक प्रयोग करते हुए डॉ हरदेव सिंह की 288 पृष्ठो की पुस्तक ‘बेईमान और भ्रष्टाचार’ एक पठनीय पुस्तक है। चूंकि मैं सत्संगों और संत सम्मेलनों में अपनी गहन रुचि रखता हूँ तो यह भी पूरे सामर्थ्य से कह सकता हूँ की मन – चेतना और मनोवृति पर साधू संतों द्वारा इस विषय पर लगातार कहा जाता रहा है और किताब में उन सभी पूर्व कथित उक्तियों और सूक्तियों को ही दोहराया गया है अतएव इसके चलते  प्रबुद्ध पाठकों को पुस्तक के मूल कथ्य में नवीनता का अभाव दिखेगा । - आगे अगले सप्ताह – अवधेश सिंह [10/05/2014 ]