बेईमानी और भ्रष्टाचार:
भाग -3 सुविधा के लिए खेद बनाम सुविधा शुल्क 
बेईमानी और भ्रष्टाचार: भाग -3
सुविधा के लिए खेद बनाम सुविधा शुल्क

[क्रमशः - पिछला भाग -2 से ]

इस स्थित से दो चार होता कोई भी आवेदक अपनी शारीरिक अक्षमता के चलते , समय के अभाव के चलते या तत्काल आवश्यकता के चलते या अनावश्यक दौड़ धूप से बचने के लिए व्यवस्था के इस छेद तक खुद की भी पहुँच बनाने को उत्सुक हो जाते हैं । बिना बारी , बिना लाइन , बिना काउंटर पर अपने हांथ और शरीर को रगड़ से चुट हिल किए सुविधा को प्राप्त करने की ललक सरकारी कार्यालयों पर बने इन छेदों और अंधेरगर्दी के इन बिलों की ओर आवेदक को आकर्षित करते है । वस्तुत: यही दिखाता है पीछे का सुलभ रास्ता । यही है बहु प्रचारित बैक डोर या अंडर टेबल की कुत्सित व्यवस्था जिसके कारण भारत ही नहीं वरन बहुसंख्यक देशों में महामारी की स्थित बनी हुई है ।

मेरा मानना है उक्त दफ्तरों की आवेदन संबंधी कलिष्ट – दुरूह प्रविष्टियाँ , दफ्तरों की उक्त बेतरतीब व्यवस्था और आपा धापी ही इस सुलभ रास्ते के लिए यू. एस. पी. है यानि मार्केटिंग फंडे का यूनिक सेलिंग प्वाइंट या विक्रय हेतु विशिष्ट बिन्दु ।

सुविधा के लिए खेद बनाम सुविधा शुल्क का रास्ता यहीं से दिखाई देता है। सरकारी दफ्तरों के इन्ही रंग ढंग की बदौलत यह एक कामयाब यू .एस. पी है ।


व्यवस्था के इस छेद तक अपनी पहुँच बनाने का एक ही उपाय है वह है अधिकारी से व्यक्तिगत संबंध या व्यक्तिगत संबंधी से संबंध या कोई भी वह संपर्क जिससे बिना बारी – प्रतीक्षा के काम बनता हो । कार्यों को करवाने की यह मानसिक उत्सुकता और लोभ अंतत: हमे उस व्यक्ति के सामने खड़ा कर देती है जो चाय – पानी और दफ्तर के अंदर के खर्चे की एवज में आपके काम और आवेदन के निस्तारण की पूरी ज़िम्मेदारी लेता हुआ दिखता है , थोड़े ही समय में आप हैरत में पड़ जाते हैं की कैसे इस एजेंट ने पूरे दफ्तर को अपनी पाकेट में कर रक्खा है और बिना झिझक वह सारे नियमों को ताक में रखकर सीधे – उल्टे सभी प्रपत्रों पर कार्यवाही करा कर आपको समस्त सुविधाएं देने को तत्पर है मात्र अतिरिक्त सुविधा शुल्क के ।


सरकारी कार्यालयों के दूसरे दृश्य में आवेदक का एक दिन या दो दिन संबन्धित आवेदन के प्रपत्रों का जुगाड़ करने में बीत जाता है , आज दफ्तरी छुट्टी पर है आवेदन फार्म वही देगा , आज अमुक नहीं है इन कार्यों के प्रपत्रों की कमियाँ वही देखेगा , आज अधिकारी दौरे पर हैं । इन दुरूहता से दो चार होते कई दिनों के दौड़ धूप के बाद यदि वो अपने आवेदन को जमा करने में कामयाब हो भी जाता है तो उसे इसकी पावती न देकर उसे टरका दिया जाता है यह आश्चर्य से कम नहीं की सरकारी दफ्तरों में प्रपत्रों की पावती देने और प्रपत्रों को लेने के निर्धारित कर्मचारी और काउंटर होते ही नहीं । आपको अपना काम करवाना है या पावती चाहिए ऐसे ऊबड़ खाबड़ शब्दों से कोई भी आपका स्वागत पावती के नाम कर सकता है ।

यह भी आश्चर्य से कम नहीं की निस्तारित आवेदनो , अधूरे आवेदनो , अनिस्तारित आवेदनो आदि का आंकड़ा इन दफ्तरों में होता ही नहीं, न ही इन आंकड़ो को समझने – देखने का कोई नियम आदि रहता है । इन पर नजर रखने के लिए ऐसा नहीं की सरकारी कार्यालयों में आंतरिक आडिट या निरीक्षण या विजिलेन्स नहीं हैं लेकिन यह कागजी खाना पूर्ति इनके संबन्धित विभागो द्वारा कैसे की जा रही है यह संदिग्ध है ।

मेरा मानना है सिवा केन्द्रीय मंत्रालयों से संबन्धित विभागों के कोई भी राज्य सरकार के आधीन विभाग में यह आंतरिक आडिट या निरीक्षण या विजिलेन्स की प्रक्रिया अपनाई जाती हो । शायद ही इन राज्य सरकारों के अंतर्गत विभिन्न विभागों के दफ्तरों पर उच्चाधिकारियों के निरीक्षण या आडिट होते हों ?

ऐसे में बिना सम्बन्धों के , बिना एजेंटो की सहायता के , बिना अतिरिक्त सुविधा शुल्क दिये सामान्य आवेदकों के आवेदन पर कार्यवाही और निस्तारण प्रक्रिया सम्पन्न होती हो इस पर संदेह है । यहाँ पर सरकारी दफ्तरों का सामान्य जनों के हित मेँ क्या रोल माडल हो उस पर अनुभव जनित गहन चर्चा की आवश्यकता है ,

मुझे बेहद आश्चर्य है की डॉ हरदेव सिंह की 288 पृष्ठो की पुस्तक ‘बेईमानी और भ्रष्टाचार’ पर इस संबंध में न तो चर्चा ही की गयी और न ही उनके अपने कार्यकाल के दौरान इस तथाकथित उक्त व्यवस्था से बचने के लिए उठाए गए उपायों पर प्रकाश ही डाला गया है ।

आगे अगले सप्ताह – अवधेश सिंह [24/05/2014]