बेईमानी और भ्रष्टाचार: भाग - 2

बेईमानी और भ्रष्टाचारसुविधा के लिए खेद बनाम सुविधा शुल्क

[ क्रमशः पिछले भाग -1 से ]
शहरी क्षेत्रों के सरकारी कार्यालयों में ‘अमुक काम संबंधी’ अपडेट की जानकारी जुटाना बिना अतिरिक्त सम्बन्धों के संभव ही नहीं है । सरकारी दफ्तरों में आवेदन करने से लेकर प्रमाण पत्र या अनुमति या लाइसेन्स या पंजीकरण आदि सभी काम आज इन अतिरिक्त सम्बन्धों के मोहताज हैं । कार्यों से संबन्धित दफ्तरों की कमी , दफ्तरों की मुख्य बस्ती से दूर लोकेशन और दफ्तरों की खिड्कियों या काउंटर की कम संख्या और उस पर टूटने वाली आवेदकों की बेतरतीब भीड़ हमे उन तथाकथित सम्बन्धों से संपर्क बनाने को प्रेरित करती है ।

सम्बन्धों से सीधा अर्थ दफ्तर में कार्यरत कर्मचारी या दफ्तर से जुड़े एजेंट से है। काम कोई भी हो उसका क्या हुआ , वह हो जाएगा या नहीं , औपचारिकताओं में क्या कमी है , वर्तमान क्या नियम हैं , उसके लिए फोटो कापी ही पर्याप्त है या ओरिजिनल प्रपत्र लाने होंगे , हस्ताक्षर कितने और कहाँ होंगे , प्रविष्टियाँ कौन सी अधूरी है , किन प्रविष्टियों को आवेदक द्वारा भरना अनिवार्य है , संबन्धित फार्म कहाँ मिलेगा , दफ्तर पर कर्मचारी कब तक मिलेंगे , अमुक कर्मचारी या अधिकारी का नाम क्या है उसके टेलीफोन नंबर क्या हैं, कार्य हेतु विभागीय रसीद के लिए कितने रुपए चुकाने होंगे, रसीद तुरंत मिलेगी या बाद में , रसीद लेने का काउंटर कहाँ है , काउंटर के खुलने की अवधि क्या है इस प्रकार के तमाम सवाल सिटीजन चार्टर संबंधी आदेशो निर्देशों , सूचना के अधिकार संबंधी अध्यादेशों के बाद भी अनुतरित हैं । दफ्तर के सूचना पट से लेकर पूंछ तांछ खिड़की तक इन सूचनाओं का अभाव है यदि इन सूचनाओं को जन सामान्य या आवेदकों की पहुँच में ईमानदारी से पहुंचा दिया जाए तो अधूरे या नकली प्रपत्रों से अपना उल्लू सीधा करने वालों के चलते स्थित उलट तो नहीं सकती लेकिन इसमें बढ़ोत्तरी में कमी होगी और कुछ हद तक सुधार होगा ।

शायद इन उपक्रमों – कार्यालयों की व्यवस्था में यहीं एकमात्र छेद है । कमोवेश हमारे इन्ही सरकारी दफ्तरों को या तो दफ्तर के शातिर चला रहें हैं या दफ्तर से जुड़े एजेंट । जन सामान्य के लिए सूचना के अभाव और पारदर्शिता से जुड़े सवालत सुविधा के लिए खेद के प्रमुख कारण है ।
यहाँ दफ्तर के दो दृश्य है पहले को लें तो शातिर कर्मचारी या एजेंट के द्वारा आवेदक से अतिरिक्त शुल्क जिसे सुविधा शुल्क कह सकते हैं लेकर काम का निपटान त्वरित किया जा रहा है इन दफ्तरों में आने वाली भीड़ कुछ हद तक संयमित है और घबराहट की आपाधापी नदारत है । आवेदक को पता है की अमुक काम के लिए अतिरिक्त पैसों की व्यवस्था के बाद ही काम होगा अन्यथा उसे निराशा ही हांथ लगेगी । यहाँ संबन्धित अधिकारी इस दृश्य के प्रति अपने मौन समर्थन को जारी रखता हुआ इस अतिरिक्त शुल्क उगाही में संलिप्त है और तेजी से काम को अंजाम दे रहा है क्यों की विलंब की कार्यवाही अतिरिक्त गोपनियता के इस काले धंधे को उजागर कर सकती है । अतिरिक्त शुल्क के साथ काम निपटान के तौर तरीके बड़े ही हैरत -खेज हैं जब आप सरकारी कर्मचारी की अतिरिक्त तल्लीनता को देखते है और पाते हैं की घर बैठे कैसे आप के काम बिना जूते घिसे स्वतः हो रहें है ।

जहां लंबी लाइनों में भूखे प्यासे लोग अपनी बारी का इंतिज़ार कर रहें हो , जहां बुजुर्ग धक्के खा रहा हो ,अशक्त बीमार अपनी मजबूरी की दुहाई दे रहा हो या महिला अपने स्त्रीत्व को बचाते हुए मंजिल की आपाधापी का हिस्सा हो वहीं दफ्तर से जुड़े अधिकारी या कर्मचारी धड़ल्ले से बिना बारी , बिना लाइन या बिना क्यू अपने काम निपटा रहें हो । वहाँ सरे आम धता बताते तथा-कथित परचित लोग अपने काम निपटा रहें हो , अधिकारी कक्ष के बाहर तैनात अर्दली नुमा चपरासी भीड़ के दबाव को अपने बेढंगे तरीके से झेल रहा हो। वहाँ अधिकारी से मिलने बिना बारी के लोगों को अंदर का रास्ता दिखाते शातिर कर्मचारी और एजेंट धड़ाधड़ फाइलों पर टिप्पड़ी और हस्ताक्षर ले रहे हों और इसी दफ्तर के किसी कोने में या दफ्तर के बाहर चाय के खोके पर प्रमाण पत्र , अनुमति , पंजीकरण आदि ले कर लोग संतुष्ट हो वापसी काट रहें हों ।

आगे अगले सप्ताह – अवधेश सिंह [17/05/2014]