बेईमानी और भ्रष्टाचार: भाग -6 बेईमानी और भ्रष्टाचार: भाग -6
सरकारी वेबसाइट्स से भी भृष्टाचार के नए सूत्र पात
बिलकुल यही गत सरकारी विभागो से जुड़ी वेब साइट्स के भी हैं अव्वल तो इन बहुसंख्यक वेब साइट्स में जानकारियों का नितांत अभाव है दूसरे यदि आप इन की कमियों या अन्य समस्याओं पर किसी संबन्धित अधिकारी को आप कुछ लिखना पढ़ना चाहें तो आश्चर्य है की किसी भी सरकारी वेब साइट पर इसके एडमिनिस्ट्रेटर का न तो ईमेल पता दिया है और न ही उनके अन्य संपर्क विवरण ।
शायद ही इन वेब साइट से जुड़े तजुर्बेकार अधिकारी कर्मचारी इसे समय रहते अपडेट करते हों और शायद ही इन वेब साइट्स के आडिट किए जाते हों , आज तक इस बात पर किसी का ध्यान ही नहीं गया की सरकारी प्रलेखों – दस्तावेजों की तरह ही वेब साइट पर पड़ी समिग्री की उपयोगिता, उसकी उपलब्धता तथा उससे जुड़े तकनीकी प्रक्रिया – सुरक्षा आदि आडिट दायरे में आने वाले अति महत्वपूर्ण बिन्दु हैं ।

कंप्यूटरी करण , ऑन लाइन सेवाओं , आफिस आटोमेशन , तकनीकी स्थानांतरण आदि के संस्थापन , रखरखाव , योजना , इस्टिमेट , टेंडर , ट्रेनिंग , ई वातावरण आदि के कामों को सीधे अपनी परिकल्पना , देख रेख और दृष्टिकोण से संचालित करने के मेरे अपने व्यक्तिगत 15 वर्षीय अनुभव के आधार पर मेरा यह कहना वास्तविक तथ्यों का ही सीधा आंकलन है की यदि उक्त संबंध में आप कंप्यूटर हार्डवेयर / साफ्टवेयर तथा वेब से जुड़ी तकनीकी जानकारी को आधार बनाएँ तो आप अपना माथा पकड़ कर बैठ जाएंगे।

अव्वल तो इन वेबसाइट्स का निर्माण बिना तकनीकी फीचर,विशेषता,सुरक्षा तथा उसके सर्वर के अप टाइम उसकी स्पीड आदि से जुड़े तथ्यों की जानकारी जुटाये बिना स्थानीय और अधिकारी के प्रिय वेब डिजायनर से करवाया गया है , दूसरे विभागों में जिन कर्मचारियों को इसकी सूचना समिग्री देने और डिजायनरों के साथ सहयोग का काम दिया गया होता है वे न तो कंप्यूटर से संबन्धित तकनीकी के जानकार होते है और न ही विभागीय सूचना संग्रह में उनकी विशिष्टता होती है। इसका सीधा प्रभाव वेब साइट के खुलने , उसकी जानकारी देखने , जानकारी डाउन लोड करने तथा ऑन लाइन फार्म सबमीशन में दिखाई पड़ता है । कभी एक साथ ज्यादा लोगों के द्वारा साइट्स पर हिट किए जाने पर यह साइट या तो हैंग हो कर खुलती नहीं या यह साइट अधिसंख्यक हिट के चलते लोड आने पर क्रैश हो जाया करती हैं । सूत्रों की माने तो इसके पीछे वेब साइट बनवाने से जुड़े ठेकेदारों को उनके श्रम से कम भुगतान की समस्या भी है , इस कार्य के पीछे भी अन्य विभागीय सप्लायर की तरह वेब डिजायन करने वाली कंपनी को भी स्थित से सम्झौता करना पड़ता है । 

अभी हाल में प्रशासनिक परीक्षाओं से संबन्धित कमीशन से जुड़ी वेब साइट्स की जानकारी मांगी गयी उसमें यह चौकने वाले खुलासे हुए की परीक्षाओं के कुल आवेदन कर्ताओं की संख्या की तुलना में ऑन लाइन आवेदन से जुड़े पेज और वेब साइट्स के हिट्स की संख्या लगभग 50 गुने ज्यादा रही जिसका सीधा अर्थ है की एक आवेदन कर्ता को अपनी सिंगल रजिस्ट्रेशन से लेकर फोटो –हस्ताक्षर आदि सूचना को आन लाइन सब मिट करने में लगभग 50 बार वेब साइट पर जाना पड़ा उसमें उसको 50 गुना ज्यादा समय , 50 गुना ज्यादा नेट सर्फिंग चार्जेस तथा 50 गुना ज्यादा मानसिक दबाव झेलना पड़ा । विश्व मंच पर साफ्टवेयर के मामले पर अपनी धाक जमा चुके राष्ट्र के लिए इस प्रकार की कमजोरियाँ वस्तुतः हतोत्साहित करने वाली हैं जिसके कारण अंतत संबन्धित आवेदक विभागो की चौखटों पर धक्के खाने के लिए बाध्य होता है ।
वेब साइट्स की दुर्गति , सरकारी कंप्यूटर में सहेजी बिना आडिट की जानकारियाँ , जमीन जायजाद से जुड़ी अधूरी जानकारी , व्यक्तिगत परिचय से जुड़ी अजूबी जानकारी , सरकारी कैमरों से खिची आपकी वह तस्वीर जिसे आप खुद न पहचान पाएँ से इस बात का पक्का खुलासा हो रहा है की अब कम्प्यूटरी करण जानकारी चाहने वालों के चलते सरकारी दलालों को नए निवाले का जुगाड़ बन गया है। सुविधा शुल्क के बिना क्या मजाल की आपसे जुड़ी जानकारी सरकारी कंप्यूटर में सही फीड की जाए और आपको आपकी जानकारी की प्रतिलिप मिल जाए ।
आजकल विकास प्राधिकरण , खेतिहर जमीन, अदलतों से, पंजीकरण संस्थाओं से , लाइसेन्स ,बिजली , नगर निगम, राशन , निर्वाचन आदि से जुड़े दस्तावेज़, प्रमाण पत्र एवं तथ्यों के गलत फीडिंग से भृष्टाचार के नए क्षेत्रों का सूत्रपात हुआ सो अलग , इससे निजात पाने का एक मात्र रास्ता आर टी आई एक्ट 2005 भी अपनी उपयोगिता खो रहा है क्यों की सरकारी दफ्तरों की अपनी सीमाएं है जिनसे सूचना का अधिकार और सूचना तथ्यों का सुधार दोनों कार्य आज की तारीख में दुरूह नजर आ रहें है, क्यों की यहाँ सही सूचना देने से ज्यादा महत्वपूर्ण कार्य संबन्धित दफ्तर की खाल बचाने का कार्य होता है । आर टी आई द्वारा अमूमन तो सूचना मिलती नहीं , मिलती है तो अधूरी और यदि सही सूचना मिल भी गयी तो अदालत उसे तथ्यों के रूप में मान्यता नहीं देता।
दरअसल यही कारण है की अभी भी जन साधारण लोग तलाश रहें हैं दफ्तर से जुड़े शातिर कर्मचारी या दलालों की वह जमात जिनको सुविधा शुल्क दे कर वे अपनी गत सुधार सकें अन्यथा कंप्यूटर में फीड उनसे संबन्धित उल्टे सीधे आंकड़ों के चलते वे कहीं अपनी स्थित से बेदखल न हो जाएँ ।
उन्हे चिंता है की मौजूदा निर्वाचन में उनके पास वोटर आई डी होते हुए भी निर्वाचन सूंची से उनका परिवार सहित नाम नदारत रहा है और वे वोट डालने से वंचित कर दिये गए । उन्हे चिंता है की कहीं उनसे जुड़े अन्य सूचनाएँ भी तो सरकारी कम्प्यूटरों की हार्ड डिस्क से नदारत तो नहीं हैं ।
मैं कह सकता हूँ की उनकी यह चिंता जायज है पर उसके सुधार के लिए मैं नाजायज रूप से किए जा रहे उनके व्यक्तिगत प्रयासों को सिरे से खारिज करते हुए समुचित सरकारी प्रयासों की अपेक्षा रखता हूँ ।
मुझे बेहद आश्चर्य है की डॉ हरदेव सिंह की 288 पृष्ठो की पुस्तक ‘बेईमानी और भ्रष्टाचार’ पर इस संबंध में न तो चर्चा ही की गयी और न ही उनके अपने कार्यकाल के दौरान इस तथाकथित उक्त व्यवस्था से बचने के लिए उठाए गए उपायों पर प्रकाश ही डाला गया है ।
आगे अगले सप्ताह – अवधेश सिंह [14/06/2014]