बेईमानी और भ्रष्टाचार: भाग -5 बेईमानी और भ्रष्टाचार: भाग -5

कंप्यूटरी करण से भृष्टाचार के नए सूत्र पात

बात यहीं खत्म नहीं होती दफ्तर या कार्यों को कंप्यूटरी करण का काम जिन विभागो द्वारा देर सबेर किया भी गया वो भी आधे अधूरे मन से , बिना विशेषज्ञों की सहायता के , बिना वास्तविक आवश्यकता का आकलन जुटाये , बिना कार्य संबंधी योजना का अध्यन किए हुए किया गया इसका सीधा प्रभाव दफ्तर की कार्य प्रणाली पर पड़ा । पारंपरिक कागजी फाइल , फोल्डर और कम्यूटर की फाइल –फोल्डर की खिचड़ी में इन कार्यालयों में आवेदकों का जो नुकसान हुआ उसका आकलन मुश्किल है।

वस्तुतः इसका अंदाज इस बात से लगाया जा सकता है की प्रिंटर है तो इंक नहीं इसलिए हार्ड कापी सहेज कर नहीं रक्खी जा सकी। इसी तरह बिना यू. पी. एस या बैटरी बैक अप या पावर बैक अप के कार्यालयों में क्रैश हुए कंप्यूटर की हार्ड डिस्क के डाटा की रिकवरी भी नहीं हो सकी । इसी बीच ब्राड बैंड या इंटरनेट पर आधारित सेवाओं में एंटी वायरस न होने के कारण हर दो चार महीने में डिस्क फरमेटिंग ने भी कार्यों का भट्टा बैठा दिया । दरअसल कंप्यूटरी करण भी पूरी तरह भृष्टाचार के भेंट चढ़ गया ।

आश्चर्य की बात है जिन विभागों के पास धन नहीं था उन्होने तकनीकी से कटौती कर कर अपनी जेब को भारी किया और जहां धन की समस्या नहीं थी, अकूत धन था इस मद में वहाँ ठेकेदारों ने , एजेन्टों ने या आधी अधूरी टेंडर प्रक्रिया ने कंप्यूटरी करण का काम तमाम किया । दरअसल यदि तकनीकी आडिट के दायरे में रखकर इनकी उपयोगिता का आंकलन किया जाए तो पूरे देश में अरबों रुपए के नए घोटाले खुल सकते है और आपके दाँतो तले उंगली आ सकती है ।

कंप्यूटर कल्चर के इन आधे अधूरे संस्थापन में पाईरेटेड साफ्ट वेयर और ग्रे बाजार से खरीदे अपेक्षाकृत सस्ते पेरिफेरल या डिवाइस या कम्पोनेंट ने इस आधुनिक सेवाओं का सबसे ज्यादा बंटा-ढार किया जिसके लिए आई.टी संस्थाओं में बैठे वे अधिकारी ज़िम्मेदारी के दायरे में आते हैं जिनकी मदद से ये गैर कानूनी कार्य पूरे भारत वर्ष में धड़ल्ले से चले और असेंबिल पी.सी [ देशी कंप्यूटर ] के नए व अकेले महत्वपूर्ण बाजार का जन्म नेहरू प्लेस नयी दिल्ली में हुआ जो की संबन्धित मन्त्राल्य से मात्र कुछ मिनट की दूरी पर स्थित है । हरी सब्जी की मार्केट के जैसे यहाँ का दृश्य देख कर कोई भी अचंभे में पड़ सकता है जब आप जमीन पर ढेर लगा कर बिक रही कंप्यूटर समिग्री देखते हैं ।

मैं यह भी एक सच्चाई सामने रखना चाहता हूँ शायद इसके चलते गली गली में बेहद सस्ते दरों में चलने वाले कंप्यूटर शिक्षा केंद्र कुकरमुत्तों की तरह हर जगह उग आए जिसकी बदौलत गली कूचों तक लोगों ने कंप्यूटर चलाना और उस पर काम करना सीखा ।

कम्यूटर वस्तुतः तब टाइपिंग मशीन – कल्कुलेटर से कहीं ज्यादा आगे बढ़ कर आफिस से जुड़े कार्यों , डिजाइनिग और एकाउंटिंग की विधाओं से जुड़ी नयी रोजगार पूरक शिक्षा का वह सस्ता विकल्प बन कर उभरा जिसके विषय में अमेरिका में बैठे कम्यूटर से जुड़े आका भी नहीं सोंच सके होंगे । शायद कंप्यूटर साफ्टवेयर बाजार और उस पर भारतीयो की धाक से जुड़े नए कीर्तमान में लंबी छलांग के पीछे का यह महत्व पूर्ण कारण और कारक है इससे इंकार नहीं किया जा सकता है ।

फिर भी यह कहने में हिचक नहीं है की अधूरे कंप्यूटरी करण ने , उससे जुड़े आधे अधूरे आंकड़ों ने , गलत फीड किए गए तथ्यों ने सरकारी दफ्तरों में कार्यों के लिए भटक रहे साधारण लोगों की समस्या को काम नहीं किया है वरन उसे बढ़ाया ही है ।

आगे अगले सप्ताह – अवधेश सिंह [07/06/2014]