बेईमानी और भ्रष्टाचार: भाग -4
सरकारी कामकाज यानि जो जाता है होता है नाराज :

बेईमानी और भ्रष्टाचार:भाग -4सरकारी कार्यालयों में कार्यालय संबंधी रखरखाव के चलते हो रहे अनियमन और भ्रष्टाचार की अपनी अलग ही कहानी है, इसके सभी दृश्य बिल्कुल आम है - अस्तव्यस्त उलझा दफ्तर – बिखरी फटी मुड़ी – तुड़ी फाइलों के बिखरे अंबार , टेढ़ी –मेढ़ी आड़ी – तिरक्षी खड़ी अलमारियों के बीच में फंसी बाबा आदम जमाने की धूल से सनी टेबल, उसके साथ बहुदा जंजीर में बंधी लकड़ी की पुरानी कुर्सी, उस के ऊपर झूलता फड़फड़ाता पंखा , चूने मिट्टी से पुती दीवाल पर लटकी सी ,दोनों सिरों पर काली हो रही ट्यूब लाइट की मरी मरी रोशनी, इस के बीच बैठा संबन्धित बाबू जिसके सामने एक निरीह ,मजबूर कैदी से खड़े आवेदक उसके कलम के तिलसमी से यूं बंधे दिखते है मानो की उसके हांथ की उँगलियों में फसा एक सस्ता बाल पेन नहीं है वरन कोई जादू की छड़ी है और उसके द्वारा आवेदक का बेड़ा पार होना तय है।

बीड़ी या खैनी- पान, या मसाला मुह में रखकर उसके आधे अधूरे वाक्यों से उसकी बातों को समझना भी एक जीत से कम नहीं ऐसे में बिना दाढ़ी बनाए , काले – पीले दांतों को दिखाते हुए, काम के लिए ऊपर से कुछ डिमांड करने वाली उसकी बेहूदा हंसी देख कर कोई भी घबरा सकता है। इन दफ्तरों के अधिकारियों के कमरे पर अमूमन ताले पड़े होते हैं और अधिकारी दौरे पर , किन्ही जगह यदि अधिकारी मौजूद भी रहता है तो वह शिकायत कर्ताओं , चाटुकारों और शातिर स्टाफ या एजेन्टों से घिरा मोटी गर्दन और चिकने घड़े की विशेषताओं के साथ काम कर रहा होता है जहां सीधे सादे की दाल नहीं गलने वाली होती है । आवेदक को यहाँ से निराश होना ही है ।


आज के कार्पोरेट कल्चर के दफ्तरों के वर्क स्टेशन में तत्परता से निपटाये जा रहे कार्यों के प्रति आवेदकों का आकर्षण और रुझान इस बदलाव की अपेक्षा सरकारी दफ्तरों से भी करने लगा है । कंप्यूटर से सुसज्जित आन लाइन आवेदन, सिंगल विंडो व वातानुकूलित वातावरण के साथ सिटिंग सुविधा, सूचना बोर्ड , पूंछ तांछ काउंटर , रिशेप्शन और अन्य जरूरी जन सुविधाओं से लैस आज के कार्य संस्कृति की अपेक्षा की तुलना में सरकारी दफ्तर वस्तुतः इसका उलट है ।


मुझे अपने कार्य काल में ऐसे कई मौके हासिल हुए जब मुझे कार्य -संस्कृति को कंप्यूटरी करण करने की अकेली ज़िम्मेदारी दी गयी। संचार क्षेत्र में मोनो पली के दौर में यह पहला मौका 1995-96 में दूरसंचार विभाग कानपुर के अंतर्गत उत्तर प्रदेश का पहला कम्पुटर चालित 198 शिकायत निवारण केन्द्रों की स्थापना का काम था । तब के समय में लैंड लाइन टेलीफोन अकेली और महत्वपूर्ण सेवा हुआ करती थी । पारंपरिक दूरभाष शिकायत के केन्द्रों में फाल्ट बुकिंग व फाल्ट निवारण बहु संख्यक आपरेटरों द्वारा , डाकेट पर नाम पता ,तकनीकी सूचना आदि लिखने , लाइन स्टाफ को काम सौपने और रिपोर्ट लेने आदि कार्यों पर हो रही हीला -हवाली , देर सबेर के कारण लैंड लाइन उपभोक्ताओं की नाराजगी बढ़ रही थी। फाल्ट रिपेयर के केन्द्रों में विभागीय रोक टोक से बचने हेतु मैन्युअल आंकड़ों की हेरा फेरी के चलते प्रयोगिक तौर पर यह कार्य उत्तर प्रदेश में सबसे पहले औद्योगिक महानगर कानपुर दूरसंचार में किया जाना था ।


एक तरफ उपभोक्ता के बीच अपनी मनमानी और उगाही के लिए ख्याति प्राप्त , लाइन स्टाफ और उनसे जुड़े कर्मचारी नेताओं , प्रतिनिधियों के दबाव, दूसरी तरफ कंप्यूटर से संबन्धित जानकारी रखने वाले आपरेटर्स के अभाव , नया सीखने की शून्य इच्छा शक्ति और पुराने वातावरण में जमे रमे लोगो की आम अरुचि जैसी तमाम अडचनों के बावजूद नियत समय में , मौजूदा सीमित साधनों से तब के लगभग 70,000 दूरभास नंबरों को पूरी तरह कम्प्यूटरीकृत किया गया ।
यह करना एक बड़ा ही पेचीदा काम था लेकिन उसका परिणाम कुछ ही महीनो में सामने था जहां एक तरफ विभाग की 198 शिकायत में तेजी से कमी आई वहीं इस कंप्यूटर की अतिरिक्त सुविधाओं से जन आकांक्षाओं के कई अन्य बिन्दुओं को भी मुस्तैद करने में बड़ी कामयाबी मिली । और अंततः 198 पर फाल्ट बुक करने , लाइन स्टाफ द्वारा इसे ठीक करने के एवज में अतिरिक्त भाव खाने की शिकायतों का दौर खत्म हुआ । यह एक उदाहरण है सुविधा शुल्क के लिए बन रहे वातावरण के केंद्र पर तीखा आघात का और इसके पीछे हो रही विभागीय बदनामी से बचने के उपाय का ।


ऐसा नहीं की 90 की दसक में तकनीकी उपलब्धता से प्रभावी प्रबंधन और मजबूत अंकुश नयी बात रही हो, तत्कालीन प्रधान मंत्री तथा देश को कंप्यूटर की सौगात देने वाले राजीव गांधी ने भी स्वीकारा था की ऊपर से भेजा गया 100 पैसा लाभार्थी तक पहुँच कर मात्र 15 पैसा ही रह जाता है ।


मुझे लगता है उस समय कंप्यूटरीकृत करने का काम तेजी पर था सभी विभागों में जहां जन साधारण को जन सुविधा के लिए या आवेदकों का सीधा आना जाना था वहाँ इसको करने की योजना – इस्टिमेट या चर्चा तेजी पर थी शायद इस को समझने में सरकार से जुड़ी एजेंसियों ने आलस किया और इसके चलते सुविधा शुल्क , चाय पानी , ऊपर से , अंडर टेबल आदि आदि के नए रास्ते खुलते गए और अंततः ऐसा लगने लगा जैसे कुएं में ही भांग पड़ी है ।


आगे अगले सप्ताह – अवधेश सिंह [31/05/2014]