बेबाक बात 


 

     हिंदी पखवारा " बेचारा हिंदी अधिकारी  - अवधेश सिंह  

 हिंदी पखवारा प्रत्येक वर्ष १ सितम्बर से 30 सितम्बर के मध्य मनाया जाता है यह अपने मूल रूप में सरकारी दफ्तरों के द्वारा किया जाने वाला एक वार्षिक  कार्यक्रम के रूप में सरकारी / अर्ध सरकारी वह इवेंट है जो कई बार एच० आर० अनुभाग या पर्सनल अनुभाग की मज़बूरी बन जाता है.ओ० एल० यानि आफिस लेन्गवेज के सभी कर्मचारी अधिकारी की छुट्टियाँ इस पखवारे के दौरान दस दिन पूर्व से ही निरस्त कर सबको एक जुट जुटना जो पड़ता है। ओ० एल० यानि आफिस लेन्गवेज अनुभाग की गहमा गहमी इन दिनों देखते ही बनती है बाकी दिनों जैसा दृश्य कहाँ।

             अमूमन हिंदी पखवारा में अधिकतर कार्यालयों में अति सीमित वर्ग में कर्मचारी  अधिकारी हिंदी कार्यक्रम में दिखाई पड़ते हैं. कई बार यह संख्या बढ कर उनके मित्र या सीमित हिंदी दोस्तों से ज्यादा भी हो जाती है. ऐसे में हिंदी अधिकारी की व्यक्तिगत मित्रता काम आती है उसके कहने से उसके विभागीय मित्र उनसे जुड़े एक आधा और भी कार्यक्रमों की लम्बी श्रंखला में अपनी उपस्थिति दर्शा देते हैं                                

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             हिंदी पखवारा नाम में ही ग्लैमर नहीं है , अरे भाई कौन समझदार अपना कीमती समय गवां कर इसमें हिस्सा ले , क्या फायदा। …। बिजनिस मीटिंग , प्रजेंटेशन , इंस्पेक्शन , रिपोर्ट , प्रोजेक्ट , टेंडर आदि से फुरसत हो तभी तो हिंदी के विषय में सोचा जाये।

 हिंदी पखवारे हेतु यह प्रयास ,ऐसा विचार ,इस प्रकार के सोंच प्रत्येक वर्ष आयोजक वर्ग को झेलने पड़ते है ऐसा नहीं की वे इसके बावजूद हिंदी विकास, हिंदी बढ़ावा के नाम पर अपनी कोशिस से कार्यक्रमको सफल बनाने का समुचित प्रयास नहीं करते हैं , करते हैं तभी कहीं इसे तामझाम के साथ , बैनर झंडी सजावट के साथ किया जाता है, कहीं बस येन तेन प्रकारेण निपटा सा दिया जाता है। 

             यह हिंदी पखवारा दिनांक १४ सितम्बर जिस दिन हिंदी भाषा को भारतीय संविधान ने राष्ट्र भाषा के रूप में मान्यता दी थी उसकी स्मृति स्वरूप आयोजित किया जाता है ताकि इस दिन हिंदी की सरकारी महत्ता को बल मिले।  यह दिन एक प्रकार से स्वतन्त्र भारत में हिंदी के जन्म दिवस के रूप में भी माना गया , तभी से इस दिन पूरे भारत वर्ष के सभी सरकारी दफ्तरों , उनसे जुड़े विभागों , मंत्रालयों , दूतावासों आदि में एक समारोह कार्यक्रम हिंदी के नाम पर फिक्स रहता है. सभी अनुभागों - विभागों के सूचना पटल पर कार्यक्रम की सूचना ज्ञापन जड़ा जाता है यह भी एक वार्षिक उपलब्धि जैसा ही दीखता है क्यों की इन पटलों पर बाकी वर्ष अंग्रेजी राज्य जो रहता है।

 कार्यक्रम में सभी विभागों के प्रतिनिधित्व के बाद भी यह हिंदी पखवारा कार्यक्रम ऐसा लगता है जैसे किसी यतीम का जन्म दिन............." 

एक वर्ग इसमें अपनी गंभीर लगन दर्शाता है पर असली माई बाप कौन यह नहींपता लगताहर व्यक्ति इस व्यवस्था के साथ जुड़ कर

 भी अलग अलहदा दिखाई पड़ता है और जिम्मेदारी के सवाल पर बस एक ही व्यक्ति पकड़ में आता है , वह है हिंदी अधिकारी.

                     और उस एक हिंदी अधिकारी से ज्यादा इस बात की पीड़ा और कौन समझ सकता है। अगस्त की शुरुआत में हीफाइलों में 

कार्यक्रम की लम्बी चौड़ी फेहरिस्त फंड की ब्यवस्था के चलते कटते पिटते ऐसी बन जाती है जिसे कार्यक्रम  कह कर कार्यक्रम का 

सांकेतिक आयोजन ही कहा जाय तो उचित रहेगा , शुरुआत की लम्बी चौड़ीबातें , विचार विमर्श फाइलों की नोटिंग में असीमित से

 कैसे सीमित बनती हैं यह यदि देखना है तो हिंदी पखवारेकी फाइलों को सन्दर्भ में कभी भी लें लें , कुछ भी अतिश्योक्ति नहीं लगेगा।

             फ़ाइनल कार्यक्रम  जिसमें कुछ एक प्रतियोगिता , सुलेख , पत्र - टिप्पणी, निबंध लेखन , वादविवाद , कविता आदि प्रतियोगिता के माध्यम से हिंदी पखवारा मनाने को अनुमोदन तो आ गया अब समस्या इसके प्रतिभागियों को जुटाने , उनकी प्रतियोगिताओं को संपन्न कराने , पुरुष्कार वितरण आयोजन करने आदि की होती है। 

                हिंदी अधकारी की नींद गायब , दिमाग सब जोड़ तोड़ में लग जो पड़ता है. तभी ज्ञात होता है की कार्यक्रम के

मुख्य अतिथि का निर्वाह करने वाले महाशय निर्धारित दिन शहर से बाहर हैं और फिर एक नयी मैराथन, कार्यक्रम के अमूल चूल बदलाव की , सबको इस बदलाव की सूचना देने और इसे सुनिश्चित करने की।

                    बस निरीह हिंदी अधिकारी भागा भागा कभी यहाँ इस दफ्तर तो कभी उस दफ्तर। अंततः यह पखवारा पुरुष्कार वितरण , अतिथि - मुख्य अतिथि के भाषण , कुछ एक सांसकृतिक गतिविधियों -स्वल्पाहार जैसे आयोजन से एक अति आवश्यक वार्षिक कार्यक्रम जैसा संपन्न हो जाता है, रह जाती हैं इस बड़ी कवायद की वास्तविक उपलब्धि का आकलन जो की हमेशा की तरह शून्य ही दिखाई पड़ता है.................अवधेश सिंह