बजट पर व्यंग बजट

1.

जब भी होती है
बजट की सुगबुगाहट
महंगाई कर देती है
हर दरवाजे
अपने क़दमों की आहट ।

2.

धनपुत्रों के महलों में
रेशमी परदे लहरा रहें हैं
झोपड़ी में
फटेहाल आधा तन ढके
गरीब की अस्मत को
बजट में
उनकी भागेदारी
समझा रहें है।

3.

राज सुविधा भोगी
सत्ता नशीनो को
बार डांस में कामकाजी
हसीनो को
शराब ठेकों की
लाइन में खड़े
शौकीनों को
बजट से कैसा सरोकार
यह बिन्दु
बजट में कब आता है
इसलिए उनका
बजट से क्या नाता है।

4.
बजट में वेतन भोगी
तन्खयिया का
बढे टैक्स पर
फिर से रोना है
बस की लाइनों
सरकारी अस्पताल की
चौखटों पर मध्यम वर्ग को
हैरान – परेशान होना है
खेतों की माटी में
सने शरीरों को
कम दामों की उपज ही
बीते वर्षो सा
बाजार तक ढ़ोना है
यह बजट का
वेतन भोगी व कृषि पर
अति आवश्यक कोना है ।

5.

फिर पकड़ा गयी
बजट की यह वर्षांत किस्त
बेरोजगार युवाओं
को धूल खाती
डिग्री उपाधियों की बेकाम लिस्ट
गृहणी देखती रही बेबस
हर बजट बाद रसोई की
छोटी होती फेहरिस्त ।

7.
बजट नहीं बन सका
लगी आग पर जल बौछारों का
दमकल दल
दिखती रहेगी
बच्चों के दूध की
खाली बोतल
जनता झेलेगी पूरे वर्ष
सब्जी - अनाजों
के दामों की बढती हलचल
बढ़ती है रोज दरें
सिलेन्डर –डीजल –पेट्रोल की
सालाना बजट कैसे दिखे सफल ।

- अवधेश सिंह 
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