बाअदब बामुलाहिजा अर्ज हैबाअदब बामुलाहिजा अर्ज है !

जिंदिगी घड़ी की मानिंद बेखौफ, बेमियाद, बदस्तूर चल रही है , चाहे - अनचाहे जो कुछ भी घटित हो रहा है वो कहीं न कहीं हमे सीधे आगे से या पीछे से धक्का देता ही है , हम इसको अपने लिए एक बेहतर अवसर समझे या बदसूरत हादसा यह परिस्थितियों पर निर्भर करता है । यह विशिष्ट कालम एक आवारगी की चेतना और उसके चारो ओर की घटनाओं पर एक बेबाक टिप्पणी है इसका मकसद मात्र आत्म संतोष से ज्यादा और कुछ भी नहीं है , किसी के प्रति पूर्वाग्रह या कोई वाद या अपवाद की सोंच की सीमा से परे यह व्यंगात्मक रचना - लेख से यदि किसी को जाने - अनजाने ठेस लगे तो इसके लिए मैं क्षमा प्रार्थी हूँ - अवधेश सिंह 

21/05/2014 

बाअदब बामुलाहिजा अर्ज है

चैनल और पत्रों की

मुख्य खबर है आज ,

बीएसपी एसपी पर

गिरि हुई है गाज।

बहन जी और नेता जी

सब पर हैं नाराज

सब पर है नाराज, मनाएँ अपनी वे खैर ।

भोली भाली जनता से अब न ठाने बैर ॥

अब न ठाने बैर देश का ठोस अमल है ।

गली नुक्कड़ चौराहे पर खिला कमल है ॥ - अवधेश सिंह


23/05/2014 

बाअदब बामुलाहिजा अर्ज है

 

सत्ता और सट्टा के

संबंध दिख रहे आम

आडवाणी 15 पैसे में

जोशी के अब 45 दाम

 

जोशी के अब 45 दाम

यह कैसा बना गठजोड़

कैबिनेट के लाने भारी

हो रहे हैं जोड़ तोड़

 

पतलून के अंदर ही

जैसे जमे कमीज

जैसे चाय की टेबल पर

अच्छा लगते है कुकीज़

वैसे सत्ता और क्रिकेट को

अब भाने लगे बुकीज़                      - अवधेश सिंह

06062014

बमुलाहिजा बाअदब अर्ज है :

 

अच्छे दिन आने वाले हैं

दिखने लगे बड़े आसार ।

 

काम की न हो कोई कोताही

नहीं चलेगी लापरवाही

चलेगी जनता की दरकार

मंत्रालय के दफ्तर में

मचा हुआ है हाहाकार। 

 

छै दिन के कार्य दिवस

को पास कर रही है सरकार

शनीवार दफ्तर बैठेंगे

बाबू सभी दिखें लाचार

 

अच्छे दिन आने वाले हैं

दिखने लगे बड़े आसार । - अवधेश सिंह

24062014

बमुलाहिजा बाअदब अर्ज है :

 

आने वाला कुछ ही दिनों में

बजट का सालाना त्योहार ।

जनता के सर फिर जाएगा

घाटे का सरकारी भार ॥

घाटे का सरकारी भार

जनता होती जाती त्रस्त ।

काम का नहीं कोई भी

आजमाए हैं सारे अस्त्र ॥

ठगे गए से हम हैं देखते

आती जाती कई सरकार ।

सब कुछ बदल रहा है दोस्त

नीयत न बदली एक भी बार ।

 - अवधेश सिंह

08072014

बमुलाहिजा बाअदब अर्ज है :  आम बजट पर आम प्रतिक्रिया

1.

जब भी होती

है बजट की सुगबुगाहट

महंगाई  कर देती है

हर दरवाजे

अपने क़दमों की आहट।

 2.

धनपुत्रों के महलों में

रेशमी परदे लहरा रहें हैं

झोपड़ी में फटेहाल

आधा तन ढके

गरीब की अस्मत को

बजट में उनकी

भागेदारी समझा रहें है ।

3.

राज सुविधा भोगी

सत्ता नशीनो  को

बार डांस में कामकाजी

हसीनो को

शराब ठेकों की लाइन में खड़े

शौकीनों को

बजट से कैसा सरोकार

यह बिन्दु

बजट में कब आता है

इसलिए उनका

बजट से क्या नाता है ।

 4.

बजट में वेतन भोगी

तन्खयिया का

बढे टैक्स पर फिर से  रोना है

बस की लाइनों - सरकारी अस्पताल की चौखटों पर

मध्यम वर्ग को हैरान – परेशान होना है 

खेतों की माटी में सने शरीरों को

कम दामों की उपज ही

बीते वर्षो सा बाजार तक ढ़ोना है

यह बजट का

वेतन भोगी व कृषि पर अति आवश्यक कोना है ।

5.

फिर पकड़ा गयी

बजट की यह वर्षांत किस्त

बेरोजगार युवाओं

को  धूल खाती, डिग्री उपाधियों

की बेकाम लिस्ट

गृहणी देखती रही बेबस 

हर बजट बाद रसोई की

छोटी होती फेहरिस्त ।

7.

बजट नहीं बन सका

लगी आग पर जल बौछारों का दमकल दल

दिखती रहेगी बच्चों के  दूध की खाली बोतल

जनता झेलेगी पूरे वर्ष

सब्जी - अनाजों के दामों की बढती हलचल

बढ़ती है रोज दरें सिलेन्डर –डीजल –पेट्रोल की

सालाना बजट कैसे दिखे सफल - अवधेश सिंह

18072014

बमुलाहिजा बाअदब अर्ज है : वैदिक जी से व्यक्तिगत मुलाक़ात के आधार पर मैं बस यह कह सकता हूँ की आज भी उनमें युवाओं जैसी जोश और उत्साह है और वे पूर्ण देशभक्त हैं जिस पर उंगली उठाने वाले उन्हे बिल्ट्ज के आर के करंजीया जैसा बनाने का अतिरिक्त उत्साह दिखा रहें हैं जिसने अटल बिहारी बाजपई जी को देश द्रोही बनाने की मुहिम इमेर्जेंसी का दौरान कर रक्खी थी जो सद्दाम हुसैन और कर्नल गद्दाफ़ी के हरम तक सीधा जाने की क्षमता से लैस था , कृपया 70-80 के दशक के अखवारों में तलाशे आपको बहुत सी नयी सच्चाईयों का ज्ञान हो सकता है । वैदिक का प्रयास निस्वार्थ और देश हित की दिशा में एक नयी पहल को जन्म दे सकता है ... 


दहशतगर्द को मासूमियत का दर्द नहीं
उसे जैसे खून करने का रोजगार मिला है। 
मर्द औरत हों या हों बीमार बूढ़े, बच्चे
गोली बम उसकी फितरत का सिला है॥

चलो झाँके उसके दिल में अंदर तक
ढूंढें चलकर उसकी धडकनों के वजूद । 
किसी का बेटा है, भाई है रिश्तों में ,
कहीं किसी से तो उसका दिल मिला है ॥- अवधेश सिंह

22/05/2014 

बाअदब बामुलाहिजा अर्ज है

 

सुन भाई ताजा आज के हाल

नितिन गडकरी से भिड़ने पर

बेल मसौदे पे अड़ने पर

तिहाड़ गया है केजरीवाल ।

 

आम जनों के भाव न समझे

बन गए आप के बुरे  हाल

कल दिल्ली से माफी मांगी

और गलती का किया मलाल ।

 

झूठी बन गयी राय शुमारी

लगी एस.एम.एस  की बीमारी

कमजोर कैडर की बनी लाचारी

सोशल मीडिया पे घिरे सवाल ।

 

साख आप की सिमट गयी

अब बचा नहीं कोई पुर्सेहाल

ककहरा फिर से पढ़ने को

सड़कों पे उतरा पुनः बवाल ।

                     - अवधेश सिंह

 

02062014

बमुलाहिजा बाअदब अर्ज है :

 

शिक्षित हो शिक्षा मंत्री पर

तन गयी तलवार पुरानी

मंत्री पढ़ा लिखा होना है

इस पर होने लगी बयानी ...

 

शिक्षालय व्यापार हो गए,

अभिभावक लाचार हो गए ,

कोचिंग क्लासेज है मजबूरी ,

कैसे कोई करे सबूरी ,

कैसे भूले यह कहानी ......

 

देश के मानव संसाधन को

मिल जाए दिशा सयानी

सबको यही अपेक्षा है

माननीय स्मृति ईरानी.....- अवधेश सिंह

13062014

बमुलाहिजा बाअदब अर्ज है :

 

दिल्ली में कल शाम से मौसम ने करवट बदल ली

इसका एहसास दो दिन पहले नेशनल चैनल पर मौसम विभाग की भविष्य वाणी

से ही मुझे लग गया था मौसम विभाग ने आगामी एक सप्ताह तक दिल्ली वासियों को गर्मी से राहत

की बात को नकारते हुए कहा था केरल में मानसून कमजोर होने की वजह से दिल्ली सहित उत्तर भारत में अभी गर्मी से राहत के कोई आसार अगले एक सप्ताह तक नहीं है ।

आप भी अपनी राय दें अनुभव कहता है की मौसम की चाल

और मौसम विभाग के हाल में 36 का आंकड़ा हमेशा ही रहता है ...........

फिलहाल आज की कविता दिल्ली के मौसम के नाम :

 

वर्षा की बूंदों में भीगे है पत्ते कलियाँ पुष्प  सभी
प्यार से छीटें मार गया सावन का दूत अभी अभी

जेठ सुबह हो या हो दुपहरी भीषण गर्मी ही ठहरी

प्रचंड ताप सूरज की आग दूर हुई है अभी अभी - अवधेश सिंह

25062014

बमुलाहिजा बाअदब अर्ज है :

 

मेरिट और कट आफ की

घमासान की बात ।

इससे पार पाने को

जूझे छात्र दिन रात ।

सारी कोशिश बाद भी

कैम्पस में मचा बवाल ॥

 

डी यू के एडमीसन आज

बन गए एक जंजाल ।

प्रवेश को भटकते दिखे

छात्रों के हैं बुरे हाल ॥

 

यूजीसी - यूनिवर्सिटी पर

बज जाए अब ढ़ोल ।

यूजीसी ग्रांट खपत की 

खुलनी चाहिए पोल ॥

 

खुलनी चाहिए पोल

बिन्दुवार तत्काल ।

जनता भी अब जाने

इसके पुरुसाहाल ।

शिक्षालय मंदिर थे पहले

अब है जैसे कार्पोरेट माल ॥  - अवधेश सिंह

10072014

बमुलाहिजा बाअदब अर्ज है :  एक ताजा गजल आज सुबह योगा के बाद लिखी गयी ,पहली काली - कड़वी चाय से निकली , मसला रहनुमाई मे राहजनी का है :-

 

बद से बदनाम और बदजात सोंच लगती है

रहनुमा रहजन सहलाये तो खरोंच लगती है।

 

बुलेट बंदूक ने नासूर दिये जिन जिन को

बुलेट ट्रेन उन्हे गिद्धों की चोंच लगती है ।

 

कड़वी दवा और अच्छे दिन के जुमले में

मरीज किससे क्या कहे संकोच लगती है।

 

जिनके हाथों से है आम रसद बटने को  

बहुत आसान उन्हे नोंच खोंच लगती है।  

 

जिनके जिम्मे रक्खी है मशाल मैराथन 

अक्सर इन धावकों को ही मोंच लगती है।

 

वो दोस्त है या दुश्मन समझ नहीं आता  

उसकी बेरुखी बदनीयत में लोच लगती है।

 

गुलाब तेरी क्यारी मैंने जाना छोड़ दिया

कांटे गहरे न चुभें फिर भी कोंच लगती है।  - अवधेश सिंह 

15072014

बमुलाहिजा बाअदब अर्ज है :

 

एक ताजा गजल गाजा पट्टी पर हुई मासूमों की खून रेजी और वीभत्सता पर दुख और कडा प्रतिकार व्यक्त करती हुई  :-

 

गजल का कत्ल हो तो, गाजा की तस्वीर देख लो ।

मानव की लाशों पर, मुस्कराता अमीर  देख लो ॥

 

दमन की दादागिरी और फौजों का रौंदना बूटों से।

घरों कुनबों समाजों की, यह भी तकदीर देख लो।

 

अंग भंग शिशुओं की , वीभत्स लाशों के ढेर से ।                

तलाशती अपने जिगर को, माँ की जागीर देख लो ॥

 

बमों औ गोलियों के साये में, जहां हर शाम होती है ।

फिजाँ इस खूनी बस्ती की, है बड़ी बेनजीर देख लो ॥

 

अमन की आड़ के पीछे, वो सब हैं मौत के सौदाई ।

टीवी चैनल पर उन की, मुस्कराती तकरीर देख लो ॥

 

एक पट्टी सी जमी के लिए, मानवता लड़ती है क्यूँ ।     

जम्हूरियत के सीने धसी, खूनी शमशीर देख लो ॥

 

मोहब्बत इश्क अमन के, हर एक शब्द बेजाँ हो गए ।

तमन्ना तसव्वुर दफ्न किए, दिल की तासीर देख लो ॥

                      -अवधेश सिंह 

एक मार्मिक लघु कथा – पंखा लगवा दो

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