प्रेम कविताओं के संग्रह 'छूना बस मन' से 


 

दो शब्द चित्र : छूना बस मन – अवधेश सिंह

chuna bas man

" यह शब्द चित्र संभवतः दर्पण हो कर मन से भाग रहे समाज को खुद से सामना करने का अवसर देता है। अति के साथ वेग, आवेग और संबंधों में प्रतिशत दशमलव का हिसाब किताब, गड़ना संगड़ना के बीच जीत और हार के मिलने से कहीं ज्यादा छूटा टूटा बिखरा है अपना यह संसार। “छूना बस मन” एक अनुरोध है इसमें निहित दर्शन प्रत्येक बार हमें सहजता, स्नेह, जीवन के स्पंदन का संजीदा अनुभव देगा।" -अवधेश सिंह

" मॆं समझता हूं कि इन कविताओं की ताकत उनके सीधे-सच्चेपन में हॆं। न ये कृत्रिम हॆं ऒर न ही सजावटी। इतनी पकी भी नहीं हे कि उनमें से कच्चेपन की एकदम ताजा खुशबू गायब हो। प्यार की मासूमियत ऒर ललक यहां बराबर हिलोरे लेती  हॆ:"तुम्हें देख लगा/ गजलों/ की मॆंने देखी/पहली किताब।" कवि की आस्था एक ऎसे प्यार में हॆ जो किसी भी स्थिति में शिकायत के दायरे में नहीं आता। सबूत के लिए ’स्वभाव’ कविता देखी जा सकती हॆ जिसमें प्रेमिका के द्वारा प्रेम को शब्दों न बांधने का कारण उसका नारी स्वभाव खोज लिया जाता हॆ। अच्छा यह भी हॆ कि कवि की निगाह ने प्रेम को उसके एकांगी नहीं बल्कि विविध रूपों में पकड़ा हॆ। इसीलिए प्रेम में शर्त, शंका आदि की उपस्थिति को स्वीकार करते हुए नकारा गया हॆ।प्यार को अपनेपन या अपने की खोज का पर्याय माना हॆ।"   -दिविक रमेश

I most welcome our readers , thank you-

 1.
 
मैंने जब भी
पतझर से पूछा
पत्तों के झर जाने का अर्थ 
उसका इशारा था 
नयी उग रही कोंपल 
उसने कहा -
यही जीवन है 
 
अपने रिश्तो की 
मीठी कोमलता 
सहती रहती  है 
शूलों  की 
तीखी चुभन  
 
और  रोज की असलियत
 छुपा लेती  है यूँ 
फूल काटों के बीच पलती
मनमोहक सुगंध
 
 
जेठ की भरी दुपहरी
दूर उड़ते बादल में
 हम 
छाँव को तरसते हैं
सावन में वही  बादल
मेघ बन बरसते हैं
 
सुन भाई-
 
प्रकृति की करतल
जाने कब पीड़ा मिले
कब मिलने लगे
सुख संतोष के पल
 
निश्छल भाव से अक्सर
नहीं बन पाती अपनी केमिस्ट्री
 
जाँच परख से प्रेम में
अक्सर खो जाते हैं
अपने पन के मधुबन
 
सच ही कहा है
प्रेम तो स्वतः होता  है
यह नैसर्गिक 
सात्विक सास्वत भाव है 
 
छोडो सारे चिंतन
छूना बस मन 
 
2.

सूरज  रोज ही
 सुबह
हरी मखमली दूब
पर
बिखेर देता  है
चाँदी से भरी परात
और 
हो जाता है 
कण कण में उजास
 

सुहानी सांझ रोज ही तो
पेड़ो की हर 
डाली -शाखा को
 पहना देती है
 सुनहली पोशाक
 

नदी देती है
जल
वृछों से मिलते हैं 
बिन मागे ही
फल
 
सुन भाई-
 
प्रेम में
लेना- देना क्या
फैला दो
माँ सा आँचल

कंजूसी में
मत रोको 
सच्चे समर्पण
छोडो स्वार्थों से
बरगलाई
मतलबी
उलझन
छूना बस मन
 
 

                        - अवधेश सिंह

पुस्तक की समीक्षा दैनिक जागरण के रास्ट्रीय संसकरण मेंपुस्तक की समीक्षा दैनिक जागरण के रास्ट्रीय संसकरण में जाने वाले रविवारीय प्रष्ठ झंकार के  कालम मयूर पंख पर पिछले 8 सितम्बर 13 को प्रकाशित हुई, त्वरित प्रतिक्रिया स्वरूप हमारे अग्रजों , वरिष्ठ जनों , मित्रों - शुभचिंतकों की बधाई -शुभ कामनाएं व  आशीर्वाद प्राप्त हुए। जिनमे प्रमुख रूप से कानपुर से वरिष्ठ साहित्यकार गिरिराज किशोर जी , प्रमोद तिवारी ,मित्र अनिल खेतान , डा धीरेन्द्र श्रीवास्तव , कवि मित्र सुबोध श्रीवास्तव , वरिष्ठ टी वी पत्रकार मनोज राजन त्रिपाठी , वरिष्ठ पत्रकार डा संजीव मिश्र , साहित्य समीक्षक मनीष त्रिपाठी , दिनेश कुमार।  नासिक  से नव्या की संपादिका शीला डोंगरे , मुरादाबाद से अबिनिश सिंह चौहान ,दिल्ली से साहित्य से जुड़े वरिष्ठ साहित्य कार दिविक रमेश , कुंवर बेचैन , लक्ष्मी शंकर बाजपाई , अनिल जोशी , डा वरुण तिवारी, दिनेश कुमार तथा  कवि कुल मित्र हर्षवर्धन आर्य , तेजस्वरूप त्रिपाठी , मुसाफिर देहलवी , दिल्ली एंथम रचयिता सुमित चौहान, उपसंपादक साहित्य अकादिमी देवेन्द्र देवेश , रघुवीर शर्मा , वरिष्ठ कहानी कार मनीष सिंह , दिवाकर पाण्डेय , शशिकांत , कपिल नागर , अरुण जेमनी , सत्या त्रिपाठी , एस के त्रिपाठी , एस के मिश्र आदि हैं हम इसके लिए सभी के ह्रदय से आभारी हैं।  

धन्यवाद  - अवधेश सिंह