बन्द तो सब बन्द – अवधेश सिंह


band to sab band 

बन्द तो सब बन्द

आज है राजनैतिक दलों का
सामूहिक आहवाहन - भारत बंद
मैं भी इसका हिस्सा हूँ
एक एजेंडा हमारा भी
आओ आज बन्द रक्खे अक्ल के दरवाजे
आज कुछ भी नहीं होगा
श्रोता - पाठक - बुद्धिजनों के बाजार में
विचारों को उपभोक्ता वस्तु सा
लोहे की शटर में
बन्द जो रखना है
कोई भी नहीं खोलेगा सोच का पिटारा
शब्दों को नहीं निकालेगा होठों से बाहर
शब्दों की वाहिनी कलम
के पावों में भी ताले लगालो
कहीं छूट न जाएँ
आज का एजेंडा साफ़ है
बन्द रक्खो अक्ल के दरवाजे ताकि
सत्ताधारी और विपक्ष की
नूरा कुश्ती की भनक
आम आदमी को न लगे
ताकि बिचौलिए - व्यापारी
कार्पोरेट -खद्दर धारी
के संबंध उजागर न हों सके
झंडे के ऊपर लगे रंगों व चिन्हों के
अलग अलग होने पर भी
उनको थामे एक प्रकार के हाथों को
कोई पहचान न सके
अलग अलग पार्टी के वस्त्रों को पहन कर
चलने वाले हजूमों
उनके हांथों की तख्तियों पर चस्पा स्लोगनो के
मिलते हुए अर्थ से भी
उनकी अलहदा महत्वकांक्षा का कोई मतलब न निकाल ले
ऊँचे कदों की बैसाखियों को
चिन्हित न किया जा सके
और बौनो को अपना सर ऊँचा करने का मौका न मिले
रहे क्यों न आज चिड़िया उदास
इसको नहीं मिली आज दावतों की जूठी बिखरन
कुत्ता भूखा रहे तो रहे
बंद ढाबों के आगे मुह लटकाए
ठेलो , खड खड़िया , रिक्शों के मजमों को
इस छुट्टी का मजा लेने दो
आज का एक फांका बन्द के नाम
चूल्हे की बुझी आग बन्द के नाम ,
मरीजों की कराहें बन्द के नाम
स्कूलों की घंटी उदास बंद के नाम
देश बन्द तो सब बन्द ताकि
अट्ठाहस लगा सके भूख और मौत के सौदागर
मुस्करा सकें टीवी चैनलों पर बैठे चर्चा कार
अखवारों पर दुख जता सकें समाज के पैरोकार
अपना सिक्का चला सके
सत्ता पर काबिज छाया रूपी सरकार
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अवधेश सिंह

 apcskp@hotmail.com