गीत - कर्ज में डूबे किसानों पर ....

गीत - कर्ज में डूबे किसानों पर ....-	अवधेश सिंह [ 26.04.2017 ] 

मैं गीत लिखूंगा ऊसर पर

उजड़े खेतों खलिहानों पर

कौड़ी में फसलें बेच रहे

कर्ज में डूबे किसानों पर ....

 

माटी की भूख मिटाने में

वो खुद माटी बन जाता है

खेतों की उपज बढ़ाने में

उसका तन मन लुट जाता है

मैं शब्दों से प्रतिकार करूँ

ऐसे उल्टे प्रतिमानों पर ......

 

सूखे की है मार कभी

अतिवृष्टि कभी पाला है

दुनिया को अन्न देने वाला

भूखा बिना निवाला है

मैं शब्दों से सामर्थ्य भरूँ

इन बेबस इन्सानों पर .....

 

सरकारी अमले सब झूठे

सत्ता के जुमले सब झूठे

उत्सव विकास के न आए

उल्लास गाँव से सब रूठे

मैं खुशियों से मनुहार करूँ

आयें वो कच्चे मकानों पर....

 

ख़ुदकुशी की राहों पे चलते

हैं धरती पुत्र अवसादों में

कंगाली और फटेहाली

कब तक भटकेगी वादों में

मैं शब्दों से प्रहार करूँ

अवसर के अवसानों पर ...

-    अवधेश सिंह [ 26.04.2017 ]